राजनीतिक सशक्तिकरण में भारत की रैंकिंग सुधरी है जबकि स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता में वह फिसलकर 150 वें स्थान, आर्थिक भागीदारी एवं अवसर के मामले में 149 वें पायदान और शैक्षणिक उपलब्धियों के मामले में 112 वें पायदान पर आ गया है। मंच ने कहा कि भारत (35.4 प्रतिशत), पाकिस्तान (32.7 प्रतिशत), यमन (27.3 प्रतिशत), सीरिया (24.9 प्रतिशत) और इराक (22.7 प्रतिशत) में महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर बेहद सीमित हैं। उसने कहा कि भारत उन देशों में है, जहां कंपनी के निदेशक मंडल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व (13.8) बहुत कम है।
विश्व आर्थिक मंच ने कहा कि स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता के मामले में चार बड़े देशों भारत, वियतनाम, पाकिस्तान और चीन की स्थिति बहुत खराब है। यहां लाखों महिलाओं की पुरुष के समान स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं है। मंच ने भारत में (100 लड़कों पर सिर्फ 91 लड़कियां) और पाकिस्तान (100 लड़कों पर 92 लड़कियों) जैसे कम लिंग अनुपात को लेकर भी चिंता जताई है।
मंच ने कहा कि भारत ने अपनी समग्र असमानता को दो- तिहाई तक किया है लेकिन भारतीय समाज के एक बड़े छोर में महिलाओं की स्थिति अनिश्चित है और आर्थिक असमानता विशेष रूप से गहरी होती जा रही है।
साल 2006 के बाद से स्थिति खराब हुई है और भारत सूची में शामिल 153 देशों में एकमात्र ऐसा देश है जहां, स्त्री- पुरुष के बीच आर्थिक असमानता, उनके बीच की राजनीतिक असमानता से भी बड़ी है। लैंगिक समानता के मामले में नॉर्डिक देशों की स्थिति शीर्ष पर बनी हुई है। आइसलैंड के बाद शीर्ष चार में नॉर्वे, फिनलैंड और स्वीडन का स्थान है। शीर्ष दस देशों में इनके अलावा, निकारागुआ, न्यूजीलैंड, आयरलैंड, स्पेन, रवांडा और जर्मनी हैं।
1. आर्थिक अवसर : महिलाओं को कम वेतन, पुरुषों का 20 प्रतिशत
रिपोर्ट ने 153 देशों में भारत को इकलौता देश बताया, जहां आर्थिक विभेद बढ़ता गया, और राजनीतिक अंतर से अधिक रहा। केवल 35.4 प्रतिशत महिलाओें को आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने अवसर भारत में मिल रहे हैं। यह पूरी दुनिया में केवल पाकिस्तान 32.7, यमन 27.3, सीरिया 24.9 और ईराक 22.17 से ऊपर है। देश के 13.8 प्रतिशत कंपनी बोर्ड में महिला प्रतिनिधित्व है। 14 प्रतिशत महिलाएं नेतृत्वकर्ता की भूमिका में हैं। पुरुषों का मानवश्रम में जहां 82 प्रतिशत उपयोग हो रहा है, महिलाओं में यह एक-तिहाई है। इस मानक पर हम 145वें रहे। वहीं पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को वेतन भी उनका पांचवां हिस्सा ही मिल रहा है।
2. स्वास्थ्य : 100 पर 91 लड़कियां
भारत को पाकिस्तान, चीन व वियतनाम के साथ रखा गया, जहां करोड़ों महिलाओं को पुरुषों के समान स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिल रहीं। यहां हर 100 पर 91 ही लड़कियां हैं, यह लैंगिक अनुपात भी खराब रैंक की वजह बना।
3. शिक्षा : दो तिहाई ही शिक्षित
रिपोर्ट में कहा गया कि हिंसा, जबरन विवाह के हालात में भी भारत में महिला शिक्षा पर बहुत काम हो रहा है। इसके बावजूद आज भी जहां 82 प्रतिशत पुरुष शिक्षित हैं, वहीं दो-तिहाई महिलाएं ही शिक्षा पाई हैं।
4. राजनीति : संसद में 14.4 प्रतिशत ही महिलाएं
रैंकिंग के चौथे मानक राजनीतिक भागीदारी में भारत में कहा गया कि यहां बीते 50 में से 20 वर्ष महिला नेतृत्व रहा। लेकिन आज इसे इस मानक पर 122वां स्थान मिल रहा है क्योंकि संसद में 14.4 प्रतिशत ही महिलाएं हैं, यह 25.2 प्रतिशत के अंतरराष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। कैबिनेट में 23 प्रतिशत महिलाओं का होना सकारात्मक माना गया।
फोरम का दावा है कि इस वर्ष वैश्विक स्तर पर महिलाओं की स्थितियों में सुधार आया है, इसकी सबसे बड़ी वजह उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ना बताई गई।
99.5 साल लगेंगे लैंगिक समानता आने में
2019 के आधार पर फोरम का दावा है कि विश्व में लैंगिक अंतर को खत्म होने में 99.5 साल और लगेंगे। पिछले वर्ष इसमें 108 साल लगने का अनुमान था, यानी वैश्विक स्तर पर महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य और राजनीतिक भागीदारी में तेजी से सुधार आया है। हालांकि अब भी इस समय को बहुत अधिक माना जा रहा है।
बढ़ी राजनीतिक भागीदारी
- महिला पुरुष के राजनीतिक भागीदारी में अंतर को भरने में 95 वर्ष और लगेंगे, पिछले वर्ष इसमें 107 वर्ष लगने का अनुमान था
- 25.2 प्रतिशत निचले सदन की संसदीय सीटें आज महिलाओं के पास हैं, पिछले वर्ष यह 24.1 प्रतिशत था।
- 21.2 प्रतिशत मंत्री पद उन्हें मिले हैं, जो बीते साल 19 प्रतिशत थे।
लेकिन आर्थिक भागीदारी घटी
- आर्थिक भागीदारी के अंतर को भरने में 257 साल लगने का अनुमान है, बीते वर्ष यह इससे बहुत कम 202 वर्ष के लिए था।
- क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई, इंजीनियरिंग और डाटा के क्षेत्रों में उनकी सीमित भागीदारी को इसकी वजह बताया गया।