सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. एनएस चौधरी, जिन्होंने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, के मुताबिक गोवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाया था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है। इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है। खास बात, हाईकोर्ट ने कहा, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती। अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं तो उसे संविधान की 'समवर्ती सूची' में शामिल करना होगा।
सीबीआई को 'पिंजरे का तोता' क्यों कहा गया था
सीबीआई के पूर्व निदेशक सरदार जोगेंद्र सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था, जांच एजेंसी के पास एक वकील रखने का अधिकार तो है नहीं। गिरफ़्तारी हो या चार्जशीट, हर बात के लिए सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है। इस इंतजार में कई बार साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं। अफसोस की बात है कि आजादी के इतने सालों बाद भी यह जांच एजेंसी डीएसपीई एक्ट के तहत चल रही है।
सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने के लिए इसे संवैधानिक दर्जा देना होगा। इस एजेंसी को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने का एकमात्र यही तरीका है। डॉ. एनएस चौधरी कहते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट ने जयदेव बनाम भारत सरकार केस में कहा था, सीबीआई का अपना डायेक्टर प्रोसिक्यूशन होगा। बाद में जांच एजेंसी ने इसकी स्वायत्तता पर भी अंकुश लगाकर इसे पुलिस नियमों के मुताबिक काम लेना शुरु कर दिया।
ऐसे मिल सकती है सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता
अधिवक्ता एनएस चौधरी का कहना है कि सीबीआई को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए सरकार को संविधान संशोधन करना होगा। इसके लिए दोनों सदनों में अलग-अलग दो तिहायी बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरुरी है। सीबीआई के पूर्व निदेशक यूएस मिश्रा ने एक साक्षात्कार में कहा था, पूर्ण स्वायत्तता न होने के कारण जांच एजेंसी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम के मामले में निदेशक को पीएम ने बड़ी मुश्किल से मिलने का समय दिया था।
पूर्व निदेशक आरके राघवन ने भी स्वीकारा था कि जांच एजेंसी पर राजनीतिक दबाव रहता है। हर बात में मंजूरी लेनी पड़ती है, मामलों की जांच में देरी होती है, नतीजा कोर्ट की फटकार खाओ। इससे बचाव का एक ही तरीका है कि जांच एजेंसी को पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकार दिए जाएं।