फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पिंजरे से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा 'तोता', कोर्ट ने सीबीआई को बताया था असंवैधानिक

Wed, 09 Jan 2019 06:52 PM IST
अनिल पांडेय जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को 'तोता' कहा, विपक्षी दलों ने इसे सरकार की कठपुतली बताया तो किसी ने केंद्रीय जांच एजेंसी को '2019' की जीत का टूल करार दिया। इन सब आरोप-प्रत्यारोपों के बीच हम आपको बताते हैं कि 'तोता' पिंजरे से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा है। एक बात और, गोवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक करार दिया था।

विज्ञापन


केंद्र सरकार ने तुरत-फुरत इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में नौ नवंबर 2013 को दूसरे शनिवार की छुट्टी के दिन स्टे ले लिया। खास बात, तब से लेकर आज तक सुप्रीम कोर्ट में वह अपील पेंडिंग है। सरकार हर बार नई तारीख ले लेती है। यही वजह है कि 'सीबीआई' तोते की छवि से बाहर नहीं निकल पाई। 

दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिश्मेंट एक्ट-1946 में 'सीबीआई' कहीं नहीं लिखा है

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. एलएस चौधरी, का कहना है कि दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट (डीएसपीई) एक्ट-1946, के तहत सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात कही जाती है। खास बात है कि डीएसपीई एक्ट में 'सीबीआई' शब्द ही नहीं लिखा है। इस एक्ट में संशोधन हुए, मगर सीबीआई नाम फिर भी शामिल नहीं हो सका।

संविधान के किसी भी चेप्टर में सीबीआई के गठन का कहीं कोई प्रावधान ही नहीं है। चौधरी के मुताबिक, यही वजह है कि 'केंद्रीय जांच एजेंसी' को आज भी संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है। सीबीआई एक अप्रैल 1963 को एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत बनी थी। 

संविधान सभा के सदस्यों ने क्या कहा था

संविधान सभा के सदस्य नजीरुददीन अहमद और डॉ बीआर अंबेडकर ने सीबीआई जैसी संस्था बाबत कहा था, ऐसी एजेंसी केंद्र सरकार की 'संघ सूची'. के पास रहेगी। इसका कामकाज क्रिमिनल केस दर्ज करना या अपराधी को गिरफ़्तार करना नहीं होगा। यह एजेंसी केंद्र सरकार के पास विभिन्न अपराधों की जो सूचनाएं आती हैं, उन्हें क्रॉस चैक कर सकती है।

विज्ञापन


एजेंसी के पास इंटरस्टेट अपराधों की तुलना कर उसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को देने का अधिकार था। पुलिस, जो कि 'राज्य सूची' का विषय है, उसकी तर्ज पर यह जांच एजेंसी न तो किसी को गिरफ़्तार कर सकती है और न ही किसी से पूछताछ। आज सीबीआई द्वारा किसी को गिरफ़्तार करने, जांच करने या पूछताछ का जो भी अधिकार मिला है, वह डीएसपीई एक्ट के तहत संभव हो सका है।

विज्ञापन

सीबीआई को लेकर गोवाहाटी हाईकोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. एनएस चौधरी, जिन्होंने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, के मुताबिक गोवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाया था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है। इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है। खास बात, हाईकोर्ट ने कहा, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती। अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था। अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं तो उसे संविधान की 'समवर्ती सूची' में शामिल करना होगा।

सीबीआई को 'पिंजरे का तोता' क्यों कहा गया था

सीबीआई के पूर्व निदेशक सरदार जोगेंद्र सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था, जांच एजेंसी के पास एक वकील रखने का अधिकार तो है नहीं। गिरफ़्तारी हो या चार्जशीट, हर बात के लिए सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है। इस इंतजार में कई बार साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं। अफसोस की बात है कि आजादी के इतने सालों बाद भी यह जांच एजेंसी डीएसपीई एक्ट के तहत चल रही है।

सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान करने के लिए इसे संवैधानिक दर्जा देना होगा। इस एजेंसी को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने का एकमात्र यही तरीका है। डॉ. एनएस चौधरी कहते हैं कि दिल्ली हाईकोर्ट ने जयदेव बनाम भारत सरकार केस में कहा था, सीबीआई का अपना डायेक्टर प्रोसिक्यूशन होगा। बाद में जांच एजेंसी ने इसकी स्वायत्तता पर भी अंकुश लगाकर इसे पुलिस नियमों के मुताबिक काम लेना शुरु कर दिया। 

ऐसे मिल सकती है सीबीआई को पूर्ण स्वायत्तता

अधिवक्ता एनएस चौधरी का कहना है कि सीबीआई को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए सरकार को संविधान संशोधन करना होगा। इसके लिए दोनों सदनों में अलग-अलग दो तिहायी बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरुरी है। सीबीआई के पूर्व निदेशक यूएस मिश्रा ने एक साक्षात्कार में कहा था, पूर्ण स्वायत्तता न होने के कारण जांच एजेंसी को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पूर्व दूरसंचार मंत्री सुखराम के मामले में निदेशक को पीएम ने बड़ी मुश्किल से मिलने का समय दिया था।

पूर्व निदेशक आरके राघवन ने भी स्वीकारा था कि जांच एजेंसी पर राजनीतिक दबाव रहता है। हर बात में मंजूरी लेनी पड़ती है, मामलों की जांच में देरी होती है, नतीजा कोर्ट की फटकार खाओ। इससे बचाव का एक ही तरीका है कि जांच एजेंसी को पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकार दिए जाएं। 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें