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जब एयरपोर्ट पर एमआई 17 हेलीकॉप्टर से उतरने लगे गरुड़ कमांडो, देखिए वीडियो

Sun, 28 Jul 2019 02:03 PM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गांधीनगर
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गरुण कमांडो फोर्स - फोटो : ANI
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गुजरात के गांधीनगर एयरपोर्ट पर लोग तब अचंभित हो गए जब अचानक पहुंचे सेना के एक हेलीकॉप्टर से गरुड़ कमांडो उतरने लगे। कमांडों यूनिट ने उतरते ही एयरपोर्ट के रनवे पर मोर्चा संभाल लिया। इस पूरी कार्रवाई को देखने के लिए मौके पर लोगों की भारी भीड़ लग गई।
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दरअसल कारगिल विजय दिवस की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारतीय वायुसेना ने एक रक्षा ड्रिल को आयोजित किया था। जिसमें वायुसेना के एमआई 17 हेलीकॉप्टर में सवार होकर एलीट कमांडो फोर्स गरुड़ के सदस्य एयरपोर्ट पहुंचे। वे रस्सियों के सहारे एयरपोर्ट के रनवे पर उतरे और मोर्चा संभाल लिया।

कौन हैं गरुड़ कमांडो

रक्षा सेवाओं की सबसे नई इकाई गरुड़ कमांडो फोर्स की आधारशिला 2004 में रखी गई थी। सेना के पैरा कमांडो और नौसेना के मार्कोज बल की तर्ज पर प्रशिक्षित गरुड़ कमांडो कम समय में परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढालने और एक्शन लेने में विशेषता रखते हैं।

इस कमांडो फोर्स की जरूरत सबसे पहले 2001 में महसूस हुई थी जब जम्मू-कश्मीर में स्थित वायु सेना के दो हवाई अड्डों पर आतंकियों ने हमला किया। उसके बाद वायुसेना के कमांडरों ने ऐसी किसी स्पेशल फोर्स को बनाने का फैसला किया था।
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Garud Commando
पहले इस कमांडो फोर्स का नाम 'टाइगर फोर्स' रखा गया था लेकिन बाद में इसे बदलकर 'गरुड़ कमांडो फोर्स' कर दिया गया। शनिवार को पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हुए आतंकी हमले में इन्होंने अपनी जांबाजी का नमूना दिखाया और महज कुछ घंटों में चार आतंकियों को मार गिराया।

गरुड़ कमांडो भारतीय वायु सेना के एक स्पेशल फोर्स का नाम है जिसमें में कुछ चुनिंदा लोगों को कड़ी ट्रेनिंग के बाद शामिल किया जाता है। गरुड़ कमांडो की ट्रेनिंग देश में पहले से ही मौजूद दूसरे स्पेशल फोर्सेज के जैसे दी जाती है जिसमें पैरा कमांडो और मार्कोज कमांडो फोर्स के नाम शामिल हैं।

ये वायु सेना पुलिस की तरह तकनीकी संस्थानों की सुरक्षा नहीं करते बल्कि वायु सेना के अहम अभियानों में यह अहम भूमिका निभाते हैं। गरुड़ कमांडो की शुरुआती ट्रेनिंग 72 हफ्तों की होती है। इसका मतलब करीब डेढ़ साल तक। लेकिन इनकी पूरी ट्रेनिंग खत्म होने में करीब तीन साल का लंबा वक्त लगता है।
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Garud Commando

गरुड़ कमांडो की ट्रेनिंग के दौरान इन्हें आतंकवादियों से निपटने के अलावा तरह की ट्रेनिंग दी जाती है। शुरुआत के पहले तीन महीनों की ट्रेनिंग के दौरान उन लोगों को छांट कर बाहर निकाल दिया जाता है जो पहले से निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतरते या फिर उनकी क्षमता जवाब दे जाती है।

दूर दराज के इलाकों में आसानी से पहुंचने के लिए इन्हें पैरा जंपिंग की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इतने ऊंचाई कूदते समय इन्हें थोड़ा भी डर नहीं लगता। संयुक्त राष्ट्र शांति सेना का हिस्सा होने की वजह से गरुड़ कमांडो केवल देश की सुरक्षा ही नहीं करते बल्कि ये दुनिया के दूर दराज इलाकों में जाकर संकट में फंसे लोगों की मदद भी करते हैं।
 
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