गंगा को अविरल और निर्मल बनाने की मुहिम कोई नई बात नहीं है। 1986 से अब 25 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा जारी किए गए। हजारों करोड़ खर्च भी हो चुके हैं फिर भी स्थिति ढाक के तीन पात जैसी है। इतिहास में झांकें तो पता चलता है कि 85 साल पहले गंगा में प्रदूषण फैलाने की आधिकारिक शुरुआत हुई थी। नदी से छेड़छाड़ का इतिहास तो पौने दो सौ साल पुराना है।
खर्च और योजनाएं
- 1932 में यानी 85 साल पहले कमिश्नर हाकिन्स ने बनारस में एक गंदे नाले को गंगा से जोड़ने का आदेश जारी किया था।
- 1839 में राजस्व कमाने के लिए गंगा पर दो नहरों ऊपरी और निचली नहर की योजना बनी। इसी के लिए 1847 में रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज की भी स्थापना की गई थी।
- 1986 जनवरी महीने में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए योजना शुरू की। गंगा एक्शन प्लान के नाम से बनाई इस योजना पर 987 करोड़ रुपये खर्च हुए, बावजूद प्लान फेल हो गया।
- 2009 में गंगा रिवर बेसिन अथॉरिटी ने एक बार फिर गंगा सफाई का बीड़ा उठाया। 2014 तक 910.57 करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन बात नहीं बनी।
- 2014 तक गंगा की सफाई पर कुल 4,168 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, जबकि 25 हजार करोड़ के करीब बजट जारी किया गया।
- 2015 में मोदी सरकार ने गंगा सफाई के लिए नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की। पांच साल में 20 हजार करोड़ रुपये से गंगा को अविरल बनाने की तैयारी है, लेकिन दो साल बाद भी हालत पहले जैसे ही हैं।
दो बड़े शहरों में तड़पती गंगा
कानपुर : 43.5 करोड़ लीटर सीवेज हर रोज निकलता है। शहर का 39 फीसदी हिस्सा ही सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ा है और 16.2 करोड़ लीटर पानी ही साफ हो पाता है।
बनारस : 30 फीसदी घर ही सीवेज लाइनों से जुडे़ हैं। रोजाना 30 करोड़ लीटर सीवेज निकलता है। लेकिन शहर के प्लांट सिर्फ 10.2 करोड़ लीटर प्रदूषित पानी ही साफ कर पाते हैं।
आंकड़े डराते हैं
- 2500 किलोमीटर का सफर तय करने वाली गंगा के किनारे 29 बड़े शहर, 48 कस्बे और 23 छोटे नगर बसे हुए हैं।
- 1.3 अरब लीटर मल-मूत्र इन शहरों से निकलता है रोजाना, जो गंगा में छोड़ दिया जाता है।
- 60 लाख टन रासायनिक खाद 9 हजार टन कीटनाशक रोजाना गंगा में छोड़ दिया जाता है।
- 12 फीसदी बीमारियों की वजह उत्तर प्रदेश में गंगा का प्रदूषित जल है।
- 50 होना चाहिए पीने के पानी में कोलिफॉर्म का स्तर, जबकि हरिद्वार में गंगा नदी में ही कोलिफॉर्म का स्तर 5500 है।
यमुना की भी यही कहानी
- 6500 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, यमुना की सफाई के नाम पर। बावजूद इसके देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदी है।
- 102 अवैध उद्योगों का प्रदूषित पानी मथुरा में जबकि 52 अनटेप नालों का गंदा पानी आगरा से यमुना में छोड़ दिया जाता है।
- 22 किलोमीटर का सफर करती है यमुना देश की राजधानी दिल्ली में और यहां 18 नालों का पानी इसमें चला जाता है।
- 700 किलोमीटर का सफर तय करती है नदी दिल्ली से चंबल तक, यहीं सबसे ज्यादा प्रदूषण झेलती है।
रिपोर्ट: पर्यावरण एवं वन मंत्रालय भारत सरकार, ऑक्सीजन डेवेलपमेंट एडमिनिस्ट्रेशन, विश्व बैंक, यूईसीपीसीबी