जल्द ही प्रयोग हो चुके खाद्य तेल से बॉयो डीजल बनाने की मुहिम से देश भर के प्रमुख होटलों को जोड़ा जाएगा। जिससे डीजल आयात में करीब 5 फीसदी तक कमी आने की संभावना है। उन्होंने बताया कि मुंबई और पुणे में मैकडॉनल्ड्स के 100 से ज्यादा आउटलेट्स हर महीने 35,000 लीटर यानी साल भर में करीब 4.20 लाख लीटर तेल को बॉयोडीजल में बदल रही है।
कंपनी इस बॉयोडीजल का प्रयोग मैकडॉनल्ड्स को आपूर्ति करने वाले ट्रकों में कर रही है। वाहनों में कुछ तकनीकी बदलाव के साथ तकरीबन 20-25 ट्रक इसी से चल रहे हैं और रोज करीब 150 रेस्तरां को माल पहुंचा रहे हैं।
एफएसएसएआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में सालाना 2.30 करोड़ टन खाद्य तेल का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें से 30 लाख टन तेल बायोडीजल उत्पादन के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है, जिसका अनुमानित मूल्य 18,000 करोड़ रुपये होगा।
बॉयोडीजल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संदीप चतुर्वेदी का कहना है कि एफएसएसएआई और राष्ट्रीय बॉयोडीजल नीति की पहल से 10 हजार 800 करोड़ रुपयों की बचत होगी, जिससे आने वाले दो सालों में 80 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां सृजित की जा सकेंगी। उन्होंने बताया कि बॉयो डीजल बनाने के आंकड़ों में जल्द ही चीन से बराबरी कर लेंगे। चीन में हर साल तकरीबन 30 लाख टन इ्स्तेमाल हुआ खाद्य तेल अवशिष्ट के तौर पर निकल रहा है, जिसमें से 10 लाख टन का निर्यात किया जा रहा है। अकेले 30 से 40 हजार टन तेल यूरोप को ही भेजा रहा है।
कंपनियां लगा रहीं बॉयोडीजल प्लांट
देश में इस समय कुछ ही कंपनियां बचे हुए तेल को बॉयोडीजल में बदलने का काम कर रही हैं। बंगलुरू की इको ग्रीन फ्यूल्स हर साल 1200 टन बचे हुए तेल को बॉयो डीजल में कन्वर्ट कर रही है। हरियाणा के बावल में बॉयोड एनर्जी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने रोजाना 100 टन बॉयोडीजल बनाने का प्लांट लगाया है। कालिसुवरी रिफाइनरी प्राइवेट लिमिटेड ने बॉयोडीजल प्लांट लगाया है। वहीं आस्ट्रिया की कंपनी ने मुंबई में बचे हुए तेल को एकत्रित करने का मैकेनिज्म बनाया है।