फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कॉर्सेट से इंस्टा फिल्टर तक: महिलाओं का शरीर तोड़ रहा काया वाला ट्रेंड, आज भी जकड़ा है महिलाओं का शरीर और मन

Sat, 18 Oct 2025 05:29 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क

सार

विक्टोरियन युग के स्टील कॉर्सेट से लेकर आज के इंस्टाग्राम फिल्टर और कमर ट्रेनर तक, सौंदर्य के सांचे में ढलने की महिलाओं की पीड़ा जारी है। अब शरीर की जकड़न डिजिटल हो चुकी है, पर दबाव वही है, परफेक्ट दिखने का। नेशनल जियोग्राफिक की रिपोर्ट बताती है कि कैसे ये ट्रेंड आज भी मानसिक और शारीरिक पीड़ा का कारण बन रहे हैं।

विज्ञापन
AI से बनाई गई तस्वीर - फोटो : FreePik
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सौंदर्य की परिभाषा बदलती रही है पर एक चीज नहीं बदली, स्त्री शरीर को ढालने की दीवानगी। विक्टोरियन युग के तंग कॉर्सेट से लेकर आज के कमर ट्रेनर और इंस्टाग्राम फिल्टर तक, महिलाओं की असली काया तभी संपूर्ण मानी जाती है जब वह सौंदर्य के सांचे में ढल जाए। नेशनल ज्योग्राफिक की एक रिपोर्ट ने बताया है कि कैसे 19वीं सदी का यह ‘ट्रेंड’ आज भी आधुनिक रूप में महिलाओं के शरीर को तोड़-मरोड़ रहा है। इससे महिलाओं को काफी परेशानी होती है।

विज्ञापन


लंदन में 19 वीं सदी का दौर, महिलाओं की कमर जितनी पतली, प्रतिष्ठा उतनी ही ऊंची के फैशन सूत्र का रहा। स्टील की हड्डियों से बने कॉर्सेट महिलाओं के शरीर को इतना कस देते थे कि कई बार उनकी पसलियां तक टूट जातीं। फिर भी समाज कहता था, सौंदर्य त्याग मांगता है। विक्टोरियन युग में महिलाएं जो कॉर्सेट पहनती थीं, उन्हें शरीर को एकदम सीधा और कसकर आकार देने के लिए अंदर से मजबूत छड़ें व्हेल मछली की हड्डियों से बनाई जाती थीं। बाद में औद्योगिक क्रांति के साथ लचीले लेकिन मजबूत स्टील स्ट्रिप्स का प्रयोग शुरू हुआ। इन्हें ही स्टील बोन्स कहा गया। इनका उद्देश्य कमर को अत्यधिक पतला दिखाना, सीने और कूल्हों का उभार बढ़ाना था।

थकाऊ साबित हो रहे बट-लिफ्ट
सर्जिकल बॉडी कंटूरिंग जैसे लिपोसक्शन या बट-लिफ्ट महिलाओं के लिए शारीरिक रूप से दर्दनाक और मनोवैज्ञानिक रूप से थकाऊ साबित हो रहे हैं। किम कार्डाशियन और इंस्टाग्राम मॉडल्स ने 21वीं सदी में एक नया सौंदर्य मानक गढ़ा, टाइनी वेस्ट-कर्वी हिप्स। फर्क बस इतना है कि अब दर्द निजी नहीं, सार्वजनिक है लाखों फॉलोअर्स के सामने परफेक्ट बॉडी दिखाने का दबाव। विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रवृत्ति का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह अब महिलाओं के मन में जकड़न पैदा कर रही है। साइकोलॉजिस्ट डॉ. एलिजाबेथ रैपोर्ट कहती हैं, विक्टोरियन युग में महिलाएं शरीर को वास्तविक लोहे से बांधती थीं, आज वे उसे डिजिटल लोहे से बांध रही हैं।
विज्ञापन


इतिहास की पुनरावृत्ति
विक्टोरियन कॉर्सेट हो या आधुनिक स्लिमिंग बेल्ट दोनों का लक्ष्य एक ही रहा, महिलाओं को उनके बेहतर बनाने का झूठा सपना देना। 19वीं सदी में यह दबाव समाज के दर्पणों से आता था, 21वीं सदी में यह स्मार्टफोन की स्क्रीन से आता है। 20 वीं सदी में महिलाओं ने आजादी की लड़ाई सिर्फ राजनीति में नहीं, कपड़ों में भी लड़ी। कॉर्सेट उतार फेंकना एक प्रतीक था अपने शरीर पर अधिकार का। लेकिन अब डिजिटल युग में वही बंधन अदृश्य रूप में लौटे हैं।

पुराना जुनून बॉडी ट्रेंड्स में लौटा
नेशनल जियोग्राफिक बताता है कि आज वही जुनून सोशल मीडिया के बॉडी ट्रेंड्स में लौट आया है। अब कॉर्सेट की जगह वेस्ट ट्रेनर, बॉडी शेपर, फिल्टर और सर्जिकल बॉडी कंटूरिंग ने ले ली है। आज भले ही कॉर्सेट के स्टील के तार गायब हो गए हों, लेकिन तनाव और पीड़ा की जकड़न वैसी ही बनी हुई है। बस उसका रूप बदल गया है। आधुनिक वेस्ट ट्रेनर और बॉडी शेपर शरीर को कृत्रिम रूप से कसते हैं, जिससे महिलाएं घंटों तक सांस रोकने जैसी स्थिति में रहती हैं। त्वचा पर दवाब से रक्तसंचार घटता है, पेट तथा फेफड़ों पर दबाव बढ़ता है। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें