प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय सर्वशक्तिशाली है। उसे न कहने की हिम्मत केंद्रीय मंत्रियों में भी नहीं है। ऐसे में एक नौकरशाह के उसकी बात मानने से इनकार करना हैरतअंगेज बात है। सेवानिवृत्त आईएएस अफसर अनिल स्वरूप की शनिवार को विमोचन होने वाली किताब ‘नॉट जस्ट अ सिविल सर्वेंट’ में ऐसे कई खुलासे हैं।
प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र ने 2015 में पूर्व सीएजी विनोद राय को कोयला मंत्रालय में बतौर सलाहकार नियुक्त करने की तत्कालीन कोयला सचिव अनिल स्वरूप से बात की। अनिल ने फैसला मानने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि ‘हम ऐसी किसी कमेटी की निगरानी में काम नहीं करेंगे। कोयला खदानों की नीलामी का काम हमारा है और उसकी सारी जिम्मेदारी हमारी थी। इस पर जबरदस्त गरमागरमी हुई। आमतौर पर सभी पीएमओ की बात चुपचाप मान लेते हैं क्योंकि सभी संवेदनशील मामलों में अंतिम फैसला पीएमओ का ही होता है। फिर भी खतरा उठाते हुए मैं अपनी बात पर अड़ा रहा।’
उन्हें कोयला मंत्रालय में तब लाया गया, जब मनमोहन सिंह सरकार के दौरान कोयला खानों के आवंटन में 1.90 लाख करोड़ के घोटाले के आरोप लगे थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सभी आवंटन रद्द कर दिए गए थे। बिजलीघरों में कोयले की भारी किल्लत हो गई थी। कार्यभार संभालने के 72 घंटों के अंदर उन्होंने अध्यादेश तैयार किया और कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित कराई।
यूपी कैडर के आईएएस अधिकारी अनिल स्वरूप केंद्रीय शिक्षा सचिव के पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। इस पुस्तक में उन्होंने शिक्षा माफिया से निपटने की बात भी बताई है। कोयला खानों की नीलामी की और राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लांच किया। उन्होंने राजनीतिक दबाव के बावजूद कर्जदाताओं को राहत देने से इनकार कर दिया था। वह कहते हैं कि अफसरों की नियुक्ति में सरकार की मनमर्जी खत्म होनी चाहिए और अफसरों की कार्यकुशलता के आधार पर ही काम का बंटवारा और कार्यकाल निर्धारित होना चाहिए। जैसे सीबीआई, सीवीसी का है।