फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Macron in India: 'अमेरिका-चीन पर निर्भर नहीं रहना हमारी प्राथमिकता'; फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों का बड़ा बयान

Wed, 18 Feb 2026 08:02 PM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारत में कहा कि भारत और फ्रांस दोनों ही तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका या चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहते और वैश्विक समाधान में भागीदारी चाहते हैं।
विज्ञापन
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों - फोटो : एएनएआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि भारत और फ्रांस, साथ ही यूरोप, तकनीकी और डिजिटल क्षेत्र में किसी भी देश विशेष जैसे अमेरिका या चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहते। मैक्रों ने जोर देकर कहा कि उन्हें एक विस्तृत और समावेशी तकनीकी मॉडल चाहिए, जिसमें दोनों देश वैश्विक समाधान का हिस्सा बनें।
विज्ञापन


मैक्रों ने कहा 'हमारे लिए जरूरी है कि हमारे पास डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और प्रशिक्षित टैलेंट हों। यह पूरी तरह कौशल, पूंजी और कंप्यूटिंग क्षमता से जुड़ा है। हमें भरोसा है कि हमारे पास बहुत सारे संसाधन हैं और हम इस दौड़ में शामिल हैं। हालांकि हम अमेरिका और चीन से पीछे हैं, लेकिन हम प्रतिस्पर्धा में हैं।' राष्ट्रपति मैक्रों का यह बयान भारत और फ्रांस के बीच तकनीकी सहयोग, डिजिटल स्वतंत्रता और नवाचार के क्षेत्र में साझेदारी को और मजबूत करने का संकेत देता है। उनके अनुसार, दोनों देश वैश्विक तकनीकी समाधान और नए नवाचारों में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।

स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से भी मिले मैक्रों
इसके अलावा, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों बुधवार को एम्स पहुंचे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उनका औपचारिक स्वागत किया। इसके बाद मैक्रों ने यहां छात्रों से लंबी बातचीत की। उन्होंने कहा कि फ्रांस भारी संख्या में भारतीय छात्रों को अपने यहां आने देना चाहता है। साथ ही वह अधिक से अधिक संख्या में छात्रों को भारत भेजना चाहता है जिससे दोनों देशों के बीच बेहतर समन्वय बने। उन्होंने कहा कि फ्रांस भारतीय छात्रों के लिए वीजा प्रक्रिया को भी आसान करेगा जिससे वे आसानी से अपनी शिक्षा पूरी कर सकें। 
विज्ञापन


राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि दोनों देश एक दूसरे के यहां अधिक संख्या में छात्रों को भेजने पर सहमत हुए हैं। शुरुआती दौर में यह संख्या दस हजार के आसपास होगी। लेकिन, उन्होंने कहा कि यह सहयोग धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा और 2030 तक यह संख्या 30 हजार के करीब करने पर सहमति बनी है। भारतीय छात्रों के विदेश में शिक्षा ग्रहण करने से भारतीय पेशेवरों में तकनीकी क्षमता बढ़ती है जिससे लाभ मिलता है। 
विज्ञापन


विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें