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मोदी सरकार के चार साल: अपने अंतर्विरोधों से बंटा रहेगा विपक्ष या एक होगा 

Sat, 26 May 2018 09:15 PM IST
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मजे की बात है कि कांग्रेस जिस तरह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में लगभग साफ हो गई है, उसे प्रांतीय पार्टियों के बतौर जूनियर पार्टनर ही चुनाव लड़ना होगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में वह भाजपा से सीधे मुकाबले में है। ऐसे में यदि कांग्रेस सबसे बड़ा विपक्षी दल बनकर भी उभरती है तो भी संभव है कि उसे कर्नाटक फार्मूले की तरह प्रांतीय पार्टियों की सरकार ही बनवानी पड़े।

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद के शपथग्रहण समारोह में लाइमलाइट एचडी कुमारस्वामी पर नहीं थी, बल्कि उन 22 गैर-भाजपा नेताओं पर थी, जो विपक्षी एकता के नाम पर बंगलूरू में जमा हुए थे। इनमें भी सबसे ज्यादा फोकस मायावती पर था। वे कभी सोनिया गांधी के साथ दोस्ती दिखा रही थी तो कभी अखिलेश यादव के साथ। मायावती पर फोकस इसलिए आश्चर्यजनक है क्योंकि वे पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई थीं और पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में भी उन्हें 403 में से केवल 19 सीटें मिलीं। 

विपक्षी एकता की यही कहानी दिख रही है। फोटो खिंचाने के लिए एक मंच पर आना एक बात है और कई पार्टियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना एकदम दूसरी। इन दलों के अंतर्विरोध इतने हैं कि आपस में मिलकर चुनाव लड़ लें, वही बड़ी बात होगी।

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विपक्षी गठबंधन बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल की 42 में से 34 लोकसभा सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी भाजपा-विरोध के नाम पर क्या उन वामदलों को वापसी का मौका देंगी जिनके खिलाफ 35 साल लंबी लड़ाई लड़कर उन्हें विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा दिया? इसी तरह 2014 में ओडिशा की 21 में से 20 लोकसभा सींटें जीतने वाले बीजू जनता दल अध्यक्ष नवीन पटनायक क्या कांग्रेस के साथ सीटें साझा करने को तैयार होंगे। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन गई है। 

कुछ इसी तरह की हालत दिल्ली में होगी जहां की सभी सात लोकसभा सीटों पर अब भाजपा के सांसद हैं, जबकि आम आदमी पार्टी ने 2015 के विधानसभा चुनाव में 70 में से अभूतपूर्व 67 सीटें जीती थीं। क्या भाजपा का अश्वमेध रथ रोकने के लिए आप लगभग साफ हो चुकी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाएगी? 

महाराष्ट्र की बात करें तो कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस तालमेल के लिए तत्पर दिख रही हैं। लेकिन क्या इस गठजोड़ में शिवसेना भी शामिल होगी - वह शिवसेना जिसका जन्म ही कांग्रेस विरोध के लिए हुआ था - भले ही हाल के दिनों में उसके अध्यक्ष उद्धव ठाकरे भाजपा के खिलाफ रोज विषवमन कर रहे हैं? या फिर केरल में वामदल उस कांग्रेस के साथ तालमेल करेंगे, जिसके खिलाफ वे राज्य में चुनाव लड़ते रहे हैं? 

यानी उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा को छोड़कर किसी अन्य राज्य में कोई दूसरा नया विपक्षी गठबंधन बनता नहीं दिख रहा है। जो पुराने सहयोगी हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जो कांग्रेस और भाजपा दोनों के साथ अलग-अलग समय पर तालमेल कर चुके हैं। मसलन मायावती ने भाजपा के साथ मिलकर कई बार राज्य में सरकार बनाई, जबकि 1996 में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि ममता बनर्जी का उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा को समर्थन बेमानी है और इसी तरह चंद्रबाबू नायडू या के चंद्रशेखर राव का महाराष्ट्र में संयुक्त विपक्ष को समर्थन अर्थहीन होगा। यानी विपक्षी दल 545 लोकसभा सीटों में से बमुश्किल 200-210 पर भाजपा को एकजुट होकर चुनौती दे पाएंगे।

गठबंधन का खेल

विपक्षी एकता की पहली परीक्षा तो कर्नाटक की उन दो सीटों के नतीजों के रूप में सामने आ जाएगी, जहां मतदान 28 मई को हो रहा है। तभी मालूम चल जाएगा कि भाजपा को रोकने के नाम पर कांग्रेस-जद एस के नेताओं द्वारा बनाए गठबंधन को जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की स्वीकृति मिली है या नहीं।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के कैराना में हो रहे लोकसभा उपचुनाव में भी इस प्रयोग की सफलता का परीक्षण हो जाएगा। यहां समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार राष्ट्रीय लोकदल के टिकट पर लड़ रही हैं।

चुनाव प्रचार खत्म होने में महज कुछ ही घंटे शेष हैं लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने अभी तक रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन के पक्ष में वोट देने की अपील नहीं जारी की है। उनके पक्ष में प्रचार करना तो दूर की बात है। 

राजनीति में अंकगणित बेमायने होता है। यदि होता तो 1991 के बाद से 1998 तक भाजपा उत्तर प्रदेश में पचास से अधिक लोकसभा सीटें जीत रही थी। इस हिसाब से उसे विधानसभा में 250 से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए थीं। लेकिन वह विधानसभा चुनाव में बहुमत से हर बार दूर रह जाती थी और उसे बसपा के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ती थी। 

अगला लोकसभा चुनाव अभी एक साल दूर हैं। इस बीच अलग-अलग राज्यों में विपक्षी एकता के प्रयास करने वाले दलों के नए नए अंतर्विरोध सामने आते रहेंगे। उनकी सफलता इसी बात पर निर्भर होगी कि वे इन मतभेदों को कितनी जल्दी और कितनी सफलता से सुलझाते हैं।

विकास नीति - बेहतर काम से बदला नजारा

किसी भी देश के विकास का मुख्य पैमाना सड़क होती है। अमेरिका, जर्मनी जैसे देशों ने सड़क क्षेत्र को विश्वस्तरीय बना कर विकास के नए आयाम बनाए। इस दृष्टि से मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल को देखें तो नई कार्य संस्कृति के जरिए सड़क क्षेत्र का नजारा सकारात्मक रूप से बेहद बदल गया है। चाहे प्रति किमी सड़क निर्माण की बात हो या राजमार्गों की मरम्मत या लेन बढ़ाने का मामला या फिर नई परियोजना, सभी क्षेत्रों की तस्वीर बदली बदली नजर आ रही है।

खासतौर से नई सड़क के मामले में पूर्वोत्तर राज्यों के हालात बहुत बदल गए है। अकेले त्रिपुरा में 1000 किमी का राष्ट्रीय राजमार्ग इस क्षेत्र की नई कहानी कहता है। ईस्टर्न पेरिफेरल, वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे, श्रीनगर, कारगिल और लेह को 12 महीने जोड़े रखने वाली जोजिला सुरंग परियोजना, मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेस-वे जैसी परियोजना जमीन पर उतरी तो देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयां देगी। उत्तर प्रदेश में खासतौर पर एनएच 24 पर हुआ काम इस सरकार की बड़ी उपलब्धि है।

सबसे बड़ा बदलाव राज्यों के रुख में आया है। आजादी के बाद पहली बार केंद्र के साथ-साथ सभी राज्य सरकारों में सड़क के प्रति नजरिया बदला है। सड़क परियोजनाओं के मामले में अन्य राज्यों से पीछे छूटने के भय के कारण पहले की तुलना में राज्य जमीन अधिग्रहण के मामले में बढ़ चढ़कर साथ दे रहे हैं। इन्हें पता है कि विकास के पैमाने पर सड़क गेम चेंजर साबित हो रही है। सड़क निर्माण के लिए सस्ता सीमेंट, सड़क के किनारे केबल बिछाने जैसे अभिनव प्रयोग ने भी इस क्षेत्र में नई ऊर्जा भरी है। एक अन्य सकारात्मक तथ्य सड़क राजमार्ग मंत्रालय में पैसे की कमी नहीं होना है। 

विजय छिब्बर
पूर्व सचिव, सड़क परिवहन राजमार्ग मंत्रालय

कृषि नीति - खेती को ढहने से बचाना बड़ी चुनौती

बीबी अरोटे महाराष्ट्र के एक टमाटर उत्पादक हैं। 11 मई को वह 840 किलोग्राम टमाटर लेकर नवी मुंबई बाजार गए। ढुलाई और सभी खर्च चुकाने के बाद उनके पास मात्र 1 रुपया बचा। अरोटे बाजार की क्रूरता का शिकार होने वाले अकेले किसान नहीं हैं। कीमतों का गिरना किसान की चिंता बढ़ा रहा है। दलहनी फसलों में भी किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से 20 से 45 प्रतिशत तक कम दाम ही पा रहा है।

कई दशक से अब भी किसानों की नेट आय स्थिर चल रही हैं। आप मुद्रास्फीति को समायोजित करते हैं तो पाएंगे कि किसान टमाटर के लिए अब जो दाम पा रहे हैं, वही 20 साल पहले भी पा रहे थे। नीति आयोग के हालिया अध्ययन में सामने आया कि असली कृषि आय 2011-12 से 2015-16 तक के पांच साल के समय में आधे प्रतिशत से भी कम बढ़ी है।

कृषि आय की औसत वार्षिक बढ़ोतरी में 0.44 प्रतिशत की मामूली सी वृद्धि हुई, जिसका असली अर्थ है कि किसान की आय अब भी एक ही जगह पर थमी है। अगले दो साल यानी 2016-17 और 2017-18 रिकॉर्ड अनाज उत्पादन के बावजूद किसान को मिलने वाले दामों में कमी आई और उनके लिए मात्र निराशा में ही बढ़ोतरी हुई। 

फसल उत्पादन की व्यापक लागत से 50 प्रतिशत अधिक दाम दिलाने की सिफारिश करने वाले स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को पूरे देश में लागू करने का वादा मोदी सरकार ने किया था। ये मोदी सरकार के लिए फाइनल वर्ष में बड़ी चुनौती है कि कृषि को कैसे ढहने से बचाया जाए। एमएसपी का लाभ मात्र 6 प्रतिशत किसानों को मिल रहा है। आर्थिक सर्वे-2016 ने 17 राज्यों में किसान परिवार की वार्षिक आय मात्र 20 हजार रुपये मानी है। कृषि के लिए तत्काल वृहद बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

चुनौती ये है कि कृषि को कैसे ज्यादा टिकाऊ और आर्थिक रूप से सक्षम बनाया जाए, कैसे किसानों को एक निश्चित मासिक आय उपलब्ध कराएं। इसके लिए आर्थिक सोच में आदर्श बदलाव की जरूरत है, जिसमें कृषि को अधिक लाभदायक इंडस्ट्री बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। जिस समय देश रोजगार की कमी वाली तरक्की का सामना कर रहा है, केवल कृषि में स्थायी आजीविका देने की क्षमता है और इसके जरिए अर्थव्यवस्था को फिर सुदृढ़ किया जा सकता है।

देवेंद्र शर्मा कृषि विशेषज्ञ

स्वास्थ्य नीति - सेहत पर ध्यान तो  दिया, लेकिन देर से

दरअसल अब समय बहुत कम रह गया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति तो बन गई। लेकिन उसको इतनी जल्दी कैसे लागू किया जाएगा, उसका कितना असर होगा। यह अभी नहीं कहा जा सकता। जो योजनाएं बन गई हैं, उनकी शुरुआत तो हो जायेगी लेकिन वे असरदार नहीं हो पाएंगी क्योंकि न तो उनमें पूरे फंड डाले हैं और न ही संसाधन। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (एनएचपीएस) के लिए दो हजार करोड़ दिए गए हैं जबकि हेल्थ और वेलनेस सेंटर्स बनाने के लिए 1200 करोड़ रुपये। चूंकि ये योजनाएं लगभग पचास करोड़ लोगों के लिए हैं, यह राशि इनके लिए बहुत कम है।

जो स्वास्थ्य नीति पिछले साल बनी है, वह अच्छी है, हमें दिशा दिखाती है। लेकिन उसमें दो साल की देरी हुई। 2015 में बनी थी लेकिन शुरू 2017 में हुई। इसी तरह एनएचपीएस का जिक्र 2016 के बजट में था लेकिन उसका जोर-शोर से एलान 2018 के बजट में हुआ। एक तरह से उसका पुनर्जन्म हुआ। अगर वह 2016 में शुरू हो जाती तो उसकी गति अलग होती और जमीन पर असर नजर आने लगता।
 
इसमें संसाधन जुटाने और सिस्टम तैयार करने की कमी रह गई। केंद्र व राज्यों में इसे लेकर पूरा तालमेल होना चाहिए, सभी को एक मंच पर आना चाहिए क्योंकि स्कीम भले ही केंद्र की हैं, लागू तो राज्य सरकारें ही करेंगी। विस्तार से चर्चा होनी चाहिए थी। चूंकि एक ही साल बचा है इसलिए यह पूरे देश में लागू हो पाएगी, इसमें संदेह है। 

एनएचपीएस में अभी तय ही नहीं है कि यह ट्रस्ट मॉडल होगी या बीमा मॉडल। क्या राज्य सरकारें इसमें 40 फीसदी पैसा लगाने को तैयार होंगी? वे पहले से चल रही योजनाओं का क्या करेंगे? इस योजना से उन्हें कैसे जोड़ेंगी? ऐसा नहीं है कि इन समस्याओं का समाधान नहीं है। लेकिन उसके लिए समय चाहिए। 

प्रो के श्रीनाथ रेड्डी अध्यक्ष, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन  

ऊर्जा नीति - कम लागत की बिजली मिले, तो बेहतर

ऊर्जा के क्षेत्र में मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल की बात करें तो इस क्षेत्र में उपलब्धियों की भरमार है। आजादी के बाद पहली बार सभी गांवों तक बिजली पहुंच गई है। रफ्तार की दृष्टि से जल्द ही हर घर में भी  बिजली पहुंच जाएगी।

विद्युत उत्पादन व्यस्त समय की मांग 161000 मेगावाट की तुलना में दोगुनी 333000 मेगावाट हो गया है। मगर अब चुनौतियां विद्युत के वितरण और इसके लिए जरूरी ढांचा, बिजली की दर, हाथी के दांत बन रहे पुराने विद्युत उत्पादन प्लांट और बिजली की चोरी से निपटने की हैं।

विद्युत उत्पादन मांग की तुलना में बढ़ना और बिजली का देश के सभी गांवों में पहुंचना वाकई गर्व की बात है। बिजली की कम खपत हो इसके लिए एलईडी बल्ब का वितरण भी काबिलेतारीफ है। मगर अभी व्यापक सुधार होना बाकी है। खासतौर से पुराने प्लांट रखरखाव और आधुनिकीकरण के अभाव में अपनी क्षमता से बेहद कम उत्पादन कर रहे हैं।

जाहिर तौर पर इससे विद्युत उत्पादन की लागत बढ़ती है। भारत जैसे गरीब देश में अगर कम लागत पर बिजली उत्पन्न नहीं की गई तो पर्याप्त बिजली होने के बावजूद इसका लाभ एक बड़ा वर्ग पैसे के अभाव में नहीं उठा पाएगा। इंडिया पावर एक्सचेंज के हिसाब से बुधवार को प्रति यूनिट बिजली की दर 11 रुपये रही है। जाहिर तौर पर इसका कोई हल निकालना होगा।

बड़ी समस्या विद्युत वितरण और जरूरी ढांचे की है। बड़ी समस्या इसलिए भी बन जाती है कि वितरण में राज्यों को ही भूमिका निभानी होती है। ज्यादातर वितरण कंपनियां और विद्युत बोर्ड आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि मांग की तुलना में दोगुनी बिजली मौजूद होने के बावजूद हम गांव तो दूर, बड़े शहरों में भी 24 घंटे बिजली नहीं दे पा रहे। फिर एक बड़ा कारण घरेलू और व्यावसायिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर चोरी है। यह सीधे-सीधे वितरण से जुड़े विभागों में भ्रष्टाचार का मामला है। कोई भी राज्य सरकार इस पर लगाम लगाने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाती। हां, उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस दिशा में ठोस घोषणा की है। उन्होंने दो टूक कहा है कि वह किसी कीमत पर बिजली चोरी नहीं होने देंगे।

बीएम वर्मा उत्तराखंड, झारखंड, पूर्वांचल विद्युत निगम के पूर्व चेयरमैन

पीएम मोदी के दिल में दलितों, महिलाओं, कमजोरों के लिए जगह नहीं है। 70 साल में कांग्रेस ने दुनिया में हिंदुस्तान की साख बनाई, मगर मोदीजी ने इसे बर्बाद कर दिया। 
- राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष
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आंकड़े

ऊर्जा
देश की बिजली उत्पादन क्षमता
2012
1,99,877
मेगावाट
 
2018
3,44,002
मेगावाट 
इस वृद्धि में निजी क्षेत्र और सौर ऊर्जा का योगदान प्रमुख रहा।

हर गांव तक पहुंची बिजली पर हर घर अभी रोशन नहीं

सरकार का दावा
100%
हिस्से तक देशभर में पहुंची बिजली

हकीकत
17% घर अब भी रोशनी से वंचित हैं ग्रामीण इलाकों में
3,13,65,992 घरों को रोशनी का इंतजार


फिर सौ फीसदी कैसे?
अगर किसी गांव के 10 फीसदी घरों में बिजली का कनेक्शन पहुंच जाता है तो उसे विद्युतीकृत मान लिया जाता है।

बदलती परिभाषा
अक्तूबर 1997 से पहले - अगर किसी भी गांव में ट्रांसफार्मर और बिजली की तारें पहुंच गई हैं, तो इसे विद्युतीकृत माना जाता है। इसके लिए 10% घरों में बिजली पहुंचनी चाहिए।
फरवरी 2004 के बाद - स्कूल, पंचायत घर जैसी जगहों पर बिजली कनेक्शन है, तो वह विद्युतीकृत है।
मोदी सरकार का लक्ष्य - 31 दिसंबर, 2018 तक हर घर तक बिजली कनेक्शन पहुंचाना। पहले यह समयसीमा 31 मार्च, 2019 थीं।

5 राज्य जहां सबसे ज्यादा घर बिजली कनेक्शन से वंचित
उत्तर प्रदेश 1,33,27,127 
बिहार 31,98,110
ओडिशा 30,88,444
झारखंड 28,69,629
असम 22,65,140

जीडीपी 
कर बढ़ोतरी (केंद्र) 
प्रतिशत में
2014 - 10.1 %
2016 - 10.6 %
2017 - 11.2%
2018 - 11.6

स्रोत: बजट दस्तावेज

जीएसटी
अप्रैल 2017 - 93,590
सितंबर    93,029
अक्तूबर    95,132
नवंबर    85,931
दिसंबर    83,716
जनवरी 2018 - 88,929
फरवरी    85,047
मार्च     85,174
अप्रैल    1,03,458
(कर संग्रह करोड़ रुपये में)

...लेकिन नाकामियां भी
कम कृषि वृद्धि
स्थिर कीमतों पर जोड़ा गया सकल मूल्य (जीवीए)
2014   ( 5.6 )
2015   (-0.2 )
2016   ( 0.6 )
2017   ( 6.3 )
2018   ( 3.0 )

प्रतिशत बदलाव (साल दर साल) / स्रोत: सीएसओ

पिछले दो साल में एक लाख करोड़ रुपये की कृषि कर्ज माफी का भी एलान किया गया है।

- स्थिर निर्यात
2014 - 318.6
2015 - 310.4
2016 - 262.3
2017 - 275.9
2018 - 303.3
(बिलियन डॉलर में) / स्रोत: वाणिज्य मंत्रालय

- निवेश थमा
मौजूदा कीमतों पर सकल नियत पूंजी निर्मा (जीएफसीएफ), जीडीपी प्रतिशत
स्रोत: सीएसओ
2014 - 31.3
2016 - 28.5
2017 - 28.5
2018 - 28.5

बहुत सीमित रोजगार
2015 - 5.21
2016* - 0.71
2017 - 4.16
2018** - 02
(8 सेक्टरों में रोजगार, लाख में) * दिसंबर तक ** सितंबर तक 
स्रोत: वर्तमान रोजगार सांख्यिकी (सीईएस), लेबर ब्यूरो

45 लाख नई नौकरियां वर्ष 2017 में 
55 लाख नई नौकरियां वर्ष 2018 में 

(पे-रोल के शोध के अनुसार)
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