उड़ी में हुए आतंकी हमले के बाद से पाकिस्तान को लेकर देश में जबरदस्त उत्तेजना और आक्रोश का माहौल है। आम जनमानस में जहां पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाने की हिमायत की जा रही है वहीं मीडिया में भी युद्ध को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है।
हालात भी ऐसे बन रहे हैं कि केंद्र सरकार के ऊपर भी सख्त कदम उठाने और पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने का दबाव है, लेकिन बड़ा सवाल ये ही है क्या भारत पाकिस्तान एक बार फिर युद्ध के मैदान में जा पाएंगे।
हालांकि इस सवाल का जवाब ढूंढना अभी कठिन है क्योंकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब दोनों देशों को इसी तरह के जबरदस्त तनाव से जूझना पड़ा है। इससे पहले भी कई बार ऐसे मौके आ चुके हैं जब आतंकी घटनाओं के बाद दोनों तरफ तनानती बढ़ी और तलवारें मयान से बाहर आ गईं।
बार्डर पर भी सेनाओं को अलर्ट कर दिया गया और सरकारों ने भी अपनी अपनी तैयारियां मुकम्मल कर लीं, लेकिन मामला इससे आगे नहीं बढ़ सका। जानिए कब कब आए ऐसे मौके-
1999 कंधार विमान अपहरण कांड
- फोटो : india
साल 1999 की गर्मियों में भारत कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को शिकस्त देकर अभी जख्मों को ढंग से भर भी नहीं पाया था कि पाक परस्त आतंकियों ने 24 दिसंबर को काठमांडू से दिल्ली आ रहे इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण कर लिया।
आतंकियों ने अपहृत यात्रियों के बदले में भारतीय जेल में बंद पांच खुंखार आतंकियों की रिहाई और बड़ी रकम की मांग की। हफ्तेभर चली तनानती के बाद आखिर तीन आतंकियों को छोड़ने पर बात बनी और विदेश मंत्री यशवंत सिंह खुद उन्हें छोड़ने कंधार गए।
हफ्तेभर की इस जद्दोजहद के बीच कई ऐसे मौके आए जब केंद्र सरकार पर पाकिस्तान पर हमला करने का दबाव बना और पाक को सबक सिखाने की मांग की गई। लेकिन शायद कारगिल युद्ध की तपिश पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी झेल चुके थे इसलिए बात आगे नहीं बढ़ सकी।
22 दिसंबर 2000 लालकिले पर हमला
- फोटो : lal kila
कंधार विमान अपहरण कांड के बाद पाकिस्तान अपनी करतूतों से बाज नहीं आया और फिर 22 दिसंबर 2000 को घिनौनी वारदात को अंजाम दे दिया। लश्कर ए तोइबा के आतंकियों ने लालकिले में घुसकर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। हालांकि घंटों चली फायरिंग के बाद सुरक्षाबलों ने कई आतंकियों को मार गिराया और आरिफ नाम के आतंकी को गिरफ्तार कर लिया।
इस हमले में सेना के तीन जवान शहीद हो गए थे। दिल्ली की शान कहे जाने वाले लालकिले पर हमले से देशभर में गुस्से और उत्तेजना का माहौल हो गया। हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ सामने आया तो देशभर में पडोसी राष्ट्र को सबक सिखाने की मांग जोर पकड़ने लगी।
तत्कालीन एनडीए सरकार ने भी इस हमले को गंभीरता से लिया और पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया। उस समय भी यह मांग पुरजोर उठी कि भारत को पाकिस्तान पर हमला कर इसका जवाब देना चाहिए।
2001 संसद हमला
अभी तक छोटी मोटी इमारतों पर हमले करते रहे आतंकियों ने इस बार दुस्साहसिक कदम उठाते हुए भारत के दिल संसद भवन पर ही हमला कर दिया। अचानक किए गए हमले में सुरक्षाबलों के 8 जवानों और एक कर्मचारी ने शहादत देकर पांचों आतंकियों के इरादों को नाकाम कर दिया।
40 मिनट तक चली इस मुठभेड़ में 200 से ज्यादा सांसद संसद भवन के अंदर सहमे रहे थे। इस कार्रवाई के बाद देशभर में शोक और गुस्से की लहर दौड़ गई थी। इस हमले के बाद आमजन में गुस्से का आलम ये था कि तुरंत पाकिस्तान पर हमला करने की मांग की जाने लगी थी।
केंद्र की वाजपेयी सरकार ने भी इस दिशा में गंभीर विचार शुरू कर दिया था। हालांकि कुछ दिन की तनातनी के बाद मामला फिर ठंडा पड़ गया।
26/11 मुंबई अटैक
इन सबसे इतर 26 नवंबर 2008 को देश पर सबसे बड़ा आतंकी हमला तब हुआ जब दस के करीब आतंकियों ने समुंद्र के रास्ते आकर मुंबई में कोहराम मचा दिया। हमला किस कदर खतरनाक था इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान से आने वाले आतंकी बेशक दस ही थे लेकिन उनके कारण दो दिन तक पूरी मुंबई बंधक बनी रही थी।
इस हमले में 137 लोगों की मौत हो गई थी जबकि 300 से ज्यादा घायल हुए थे। मरने वालों में काफी संख्या में सुरक्षाबलों के जवान भी थे। इस हमले के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और सरकार पर पाकिस्तान को करारा जवाब देने का दबाव बन गया था।
यूपीए सरकार ने भी इसे देश की संप्रभुता पर हमला मानते हुए कड़ी कार्रवाई का मन बना लिया था। इसके लिए सीमा पर फौज को तैयारी करने के निर्देश दे दिए गए। उस समय दोनों देशों के बीच युद्ध के पूरे हालात बन चुके थे। लेकिन बाद में सरकार ने अपना मन बदल लिया और पाकिस्तान के आश्वासनों के बाद कार्रवाई को टाल दिया गया।