प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कोविड-19 संक्रमण को देखते हुए 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणा में जमीन आसमान का फर्क है। पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि यह आपस में कनेक्ट नहीं करती। शशांक अमर उजाला से बातचीत में कहते हैं कि भारत के इस राहत पैकेज की तुलना अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान के राहत पैकेज से नहीं की जा सकती। उन्होंने वास्तव में राहत पैकेज दिया है।
वहां के राहत पैकेज मानो चुनाव जितवाने वाले हैं, हमारे यहां ब्यूरोक्रेटिक
शशांक का कहना है कि जिस तरह से अमेरिका ने कोविड-19 संक्रमण के बाबत घोषणा की है, वह भारतीय भाषा में कहें तो चुनाव जितवाने वाले राहत पैकेज हैं। जबकि हमने राहत पैकेज के नाम पर एक-दो प्रतिशत इधर उधर किया है। हमारे यहां का राहत पैकेज लगता है कि ब्यूरोक्रेट ने तैयार किया है। पूरी तरह सेफ साइड लेकर चले हैं। बैंक, इस्टीट्यूशन, संस्थानों से कर्ज के जरिए इसका रास्ता बनाया है। जबकि अमेरिका आदि ने डायरेक्ट ड्राफ्ट बेसिस पर दिया है। हमारे यहां लो सेफ्टी मैकेनिज्म में आगे बढ़ रहे हैं।
राहत पैकेज तो देना पड़ेगा
पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि बिना एमएसएमई, किसान, गरीब मजदूर को स्टीमुलस राहत पैकेज दिए बात नहीं बनने वाली है। उन्होंने कहा कि देर सबेर ही सही केन्द्र सरकार को राज्यों को भी आर्थिक सहायता देनी ही पड़ेगी, क्योंकि राज्यों के पास अपनी कमाई या ऋण लेने का जरिया नहीं है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के संक्रमण से इतनी जल्दी मुक्ति नहीं मिलने वाली है। इसलिए अभी इस तरह से दबाव आगे भी बढ़ेंगे।
हम भ्रम में जीते हैं
अमेरिका समेत अन्य देशों ने अपनी प्रोडक्शन लाइन ठीक करने के लिए अपनी कंपनियों, निवेशकों के लिए बड़ी घोषणा की है। अभी तक चीन से सस्ता माल मिल जाता था और उसी पर निर्भर थे, लेकिन कोविड-19 ने उनकी भी आंखे खोल दी है। हमें और हमारे ब्यूरोक्रेट, प्लानर को लग रहा है कि वहां की कंपनियां हमारे यहां गही निवेश करेंगी। जबकि दुनिया में जहां भी उन्हें सुविधा, सप्लाई चेन मिलेगी, वहीं चीन से शिफ्ट होने वाली कंपनियां जाएगी। वह वियतनाम से लेकर कहीं भी जा सकती हैं, लेकिन हमारे यहां ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे वह सब भारत आ रही हों। सीधी सी बात है, अगर इन कंपनियों को अमेरिकी पैकेज चाहिए तो अमेरिका में ही उत्पादन ईकाइयां लगाएंगी।
जब ओडिशा ने कोरिया के अधिकारियों को गोल्फ खेलना सिखा दिया था
शशांक बताते हैं कि देश में निवेश का माहौल भी गजब बनता बिगड़ता है। जापान की कंपनियां महाराष्ट्र में एक लाख करोड़ का निवेश करने आई थी। सरकार बदल गई तो काफी कुछ बदल गया है। इसी तरह से एक बार दक्षिण कोरिया की कंपनी ने भारत में 12 अरब डालर के निवेश की इच्छा जताई। मेरे पास लोगों ने संपर्क किया तो मैंने इन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत केन्द्र सरकार के बड़े अधिकारियों के पास भेजा। मैने खुद इसके बारे में मनमोहन सिंह को बताया था, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल पाया। बाद जब उड़ीसा सरकार के लोगों से परियोजना के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि कोरियाई अफसरों को उन्होंने गोल्फ खेलना सिखा दिया। 12 अरब डालर के निवेश की बात आई गई हो गई।