पुलिस, सरकार और जनता, इन तीनों को ही अपनी कार्यशैली बदलनी पड़ेगी। मौजूदा समय में इन तीनों के बीच आपसी विश्वास की डोर टूट चुकी है। मैं यहां पर पुलिस का समर्थन नहीं करूंगा।कोरोना की लड़ाई शुरु होने से पहले तक यही पुलिस ऐसी थी कि जिसके पास जाने से लोग डरते थे। पुलिस पर रोजाना न जाने कैसे कैसे आरोप लगते थे।
जनता तो पुलिस पर बिल्कुल भरोसा नहीं करती थी। अब कोरोना में ये सब बदलाव देखने को मिल रहा है। बतौर प्रकाश सिंह, तीनों अंगों के बीच विश्चास बहाल करना होगा।पुलिस को भी कुछ ऐसा करना है कि लोग हमदर्द समझकर उसके पास जाएं।
मैं आपको पुलिस पर विश्वास का उदाहरण देता हूं। इसमें तीनों अंग शामिल हैं।ये पुलिस जो प्राचीन काल से चली आ रही है, लेकिन आज भी पुलिस के सामने दी गई गवाही को कोर्ट में नहीं माना जाता। पुलिस वाले कहां से आते हैं। क्या वे दूसरे गृह से आए हैं। हम सबके बीच से ही हैं।
पुलिस का कसूर तो है ही, मगर साथ ही उन्हें अपने एजेंडे को पूरा करने का हथियार बनाने वाली सरकारें भी दोषी हैं। राजनेता अपने सारे धंधे बंद कर दें और पुलिस को जरिया बनाना छोड़ दें तो फिर देखो ये फूल आगे कैसे नहीं बरसते।
प्रकाश सिंह के अनुसार, सबसे पहले तो केंद्र और राज्यों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुलिस सुधारों को लेकर जो कुछ कहा गया है, उसे ईमानदारी के साथ लागू करें। मसलन, पुलिस की संख्या, उनके रहने की जगह, रिफ्रेशर कोर्स, सेवाकाल से जुड़ी सुविधाएं और दूसरे अनेक पहलू हैं, जिन पर काम करना बाकी है।
कुछ बातों को लेकर कानून में बदलाव करना होगा। जैसे, मजिस्ट्रेट को यह भरोसा करना चाहिए कि पुलिस झूठ नहीं बोल रही है।ये तब मुमकिन है जब पुलिस अपनी सभी बुराईयों को छोड़कर लोगों की सुरक्षा में खुद को लगा देगी। पुलिस के प्रति लोगों को भी अपना मन साफ करना होगा।
बहुत से लोग किसी के बहकावे में आकर झूठी एफआईआर लिखवा देते हैं। यहीं से भ्रष्टाचार की कई कड़ियां जन्म ले लेती हैं।कुछ लोग तो वकील से पूछकर एफआईआर लिखवाने जाते हैं।ऐसे में तीनों संस्थाओं को आगे आकर काम करना पड़ेगा।
ये काम मुश्किल नहीं है, लेकिन इसके लिए निजी स्वार्थ का त्याग करना बहुत जरूरी है।मुझे उम्मीद है कि पुलिस, सरकार और जनता ये जरूरी चाहेगी कि फूल बरसाने का सिलसिला थमने न पाए।