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पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला की हिरासत का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

Mon, 10 Feb 2020 12:13 PM IST
Trainee Trainee पीटीआई, नई दिल्ली
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उमर अब्दुल्ला - फोटो : अमर उजाला
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जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की जन सुरक्षा कानून के तहत नजरबंदी के खिलाफ उनकी बहन सारा अब्दुल्ला पायलट ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की। न्यायमूर्ति एन वी रमणा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सारा अब्दुल्ला पायलट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस याचिका का उल्लेख किया और इसे शीघ्र सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया।

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सिब्बल ने कहा कि उन्होंने जन सुरक्षा कानून के तहत उमर अब्दुल्ला की नजरबंदी को चुनौती देते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की है और इस पर इसी सप्ताह सुनवाई करने का अनुरोध किया। पीठ इस याचिका को शीघ्र सूचीबद्ध करने पर सहमत हो गई है।

सारा अब्दुल्ला पायलट ने अपनी याचिका में कहा है कि ऐसा व्यक्ति जो पहले ही छह महीने से नजरबंद हो, उसे नजरबंद करने के लिए कोई नई सामग्री नहीं हो सकती। याचिका में नजरबंदी के आदेश को गैरकानूनी बताते हुए कहा गया है कि इसमें बताई गईं वजहों के लिए पर्याप्त सामग्री और ऐसे विवरण का अभाव है जो इस तरह के आदेश के लिए जरूरी है।
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इसमें कहा गया है, ‘यह बिरला मामला है कि वे लोग जिन्होंने सांसद, मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री के रूप में देश की सेवा की और राष्ट्र की आकांक्षाओं के साथ खड़े रहे, उन्हें अब राज्य के लिए खतरा माना जा रहा है।’

याचिका में कहा गया है कि उमर अब्दुल्ला को चार-पांच अगस्त, 2019 की रात घर में ही नजरबंद कर दिया गया था। बाद में पता चला कि इस गिरफ्तारी को न्यायोचित ठहराने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 107 लागू की गई है।

इसके अनुसार, ‘इसलिए यह नितांत महत्वपूर्ण और जरूरी है कि यह न्यायालय व्यक्ति के जीने और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा ही नहीं करे बल्कि संविधान के भाग के अनुरूप अनुच्छेद 21 के भाव की भी रक्षा करे क्योंकि जिसका उल्लंघन एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए अभिशाप है।’ याचिका में उमर अब्दुल्ला को जन सुरक्षा कानून के तहत नजरबंद करने संबंधी पांच फरवरी का आदेश निरस्त करने का अनुरोध किया गया है।

उमर ने भीड़ का उकसाने का किया काम
लोक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत हिरासत में लिए गए जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती पर संगीन आरोप लगाए गए हैं। पीएसए डोजियर में दोनों नेताओं के हिरासत की वजह यह बताई गई है कि 49 वर्षीय उमर ने जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की पूर्व संध्या पर अनुच्छेद 370 और 35-ए हटाने को लेकर भीड़ को उकसाने का काम किया था। 

उमर ने इस फैसले के खिलाफ सोशल मीडिया पर भी लोगों को भड़काया था, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी। हालांकि, डोजियर में उमर के सोशल मीडिया पोस्ट का जिक्र नहीं है। वहीं, उमर की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी और 60 वर्षीय पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती पर राष्ट्रविरोधी बयान देने और जमात-ए-इस्लामिया जैसे अलगाववादी संगठनों को समर्थन देने का आरोप लगाया गया है। इस संगठन पर गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत पाबंदी लगाई गई है।

उमर ने कहा था...तो भारत में विलय पर छिड़ेगी बहस
हरी निवास में हिरासत में लेकर जाने से पहले उमर ने आखिरी कुछ ट्वीट किए थे, जो इस प्रकार हैं...कश्मीर के लोगों के लिए, हम नहीं जानते कि हमारे लिए क्या है...सुरक्षित रहें और इन सबसे ऊपर कृपया शांत बने रहें। हालांकि, कहा यह भी जा रहा है कि डोजियर में उमर के उस बयान का भी हवाला दिया गया है जिसमें उन्होंने कहा था कि अनुच्छेद 370 समाप्त करने या इसमें बदलाव से जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ जाएगी।

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