सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे दीपक मिश्रा अब अपने पद से सेवानिवृत हो चुके हैं। उनकी जगह जस्टिस रंजन गोगोई ने बुधवार को देश के 46वें मुख्य न्यायाधीश के तौर पर शपथ ली। विविधतापूर्ण भारतीय संस्कृति और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुये पूर्व न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने हाल ही में कई समावेशी और ऐतिहासिक फैसले सुनाए थे।
उनके नेतृत्व में न्यायालय ने वैयक्तिक आजादी और गरिमा के साथ जीवन गुजारने, समता और निजता के अधिकारों की रक्षा करने के साथ ही इनका दायरा बढ़ाया और कानून के प्रावधानों से लैंगिक भेदभाव को दूर किया।
न्यायपालिका के भीतर और बाहर अनेक चुनौतियों का सामना करने वाले न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा मुख्य न्यायाधीश के रूप में संभवतः ऐसे पहले न्यायाधीश थे, जिन्हें पद से हटाने के लिये राज्यसभा में सांसदों ने सभापति एम. वेंकैया नायडू को याचिका दी थी। हालांकि तकनीकी आधार पर विपक्ष इस मामले को आगे बढ़ाने में विफल रहा था।
यह भी पहली बार हुआ था कि न्यायपालिका के पूर्व मुखिया न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर उनके ही कई सहयोगी न्यायाधीशों ने सवाल उठाये थे और यहां तक कि शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई (अब मुख्य न्यायाधीश), न्यायमूर्ति मदन बी. लोकूर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने 12 जनवरी को अभूतपूर्व कदम उठाते हुये उनके खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस कर उनपर गंभीर आरोप लगाए थे।
इन न्यायाधीशों के इस कदम से कार्यपालिका ही नहीं, न्यायपालिका की बिरादरी भी स्तब्ध रह गई थी। इसमें नया मोड़ तब आया था जब पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने मुख्य न्यायाधीश की कार्यशैली के संबंध में एक याचिका दायर कर दी थी।
बहरहाल, इन तमाम चुनौतियों को विफल करते हुये पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा निर्बाध रूप से अपना काम करते रहे। अपने कार्यकाल के अंतिम सप्ताह में उनकी अध्यक्षता वाली संविधान पीठ और खंडपीठ ने कई ऐसी व्यवस्थायें दीं, जिनकी सहजता से कल्पना नहीं की जा सकती।
मसलन, उनकी अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने दो वयस्कों के बीच परस्पर सहमति से स्थापित समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के इस अंश को निरस्त कर दिया।
इसी तरह, एक अन्य अविश्वसनीय लगने वाली व्यवस्था में परस्त्रीगमन को अपराध की श्रेणी में रखने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करते हुये उसे भी निरस्त कर दिया गया।