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क्या बाइडन के शपथ लेते ही विदेश मंत्री एस जयशंकर की शुरू हो जाएगी अग्निपरीक्षा?

Fri, 08 Jan 2021 02:47 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • शी जिनपिंग के बार-बार परोक्ष रूप से धमकी देने के मायने क्या हैं?
  • पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के अनुसार अमेरिका के लिए पांचवे पायदान पर है भारत का महत्व
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एस जयशंकर-माइक पॉम्पियो - फोटो : Amar Ujala (File)
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विस्तार
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20 जनवरी को बाइडन दुनिया के सबसे समृद्ध माने जाने वाले लोकतांत्रिक देश के राष्ट्रपति हो जाएंगे। हालांकि पिछले दो दिनों में अमेरिकी लोकतंत्र ने अपने इतिहास का सबसे काला दिन देखा है। 20 जनवरी 2021 की एतिहासिक तारीख का जितनी शिद्दत से अमेरिका के डेमोक्रेट्स को इंतजार है, उतनी ही बेसब्री से चीन, रूस, यूरोपीय देश भी इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। वहीं भारतीय कूटनीति, रणनीति, सामरिक मामले के जानकारों में भी एक बेचैनी देखी जा रही है। इसकी वजह चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का एक अधिक बार अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश देना है। माना जा रहा है कि आने वाला समय एक बार फिर कूटनीति, विदेश नीति के धुर खिलाड़ी विदेश मंत्री एस जयशंकर के लिए अग्निपरीक्षा सरीखा है।

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पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह भी मानते हैं कि पेचीदगियां थोड़ा बढ़ सकती हैं। पूर्व विदेश सचिव शशांक अभी सबकुछ आने वाले समय पर छोड़ देना चाहते हैं। अमेरिका में भारत के राजदूत रहे ललित मान सिंह को ऐसे संवेदनशील विषय पर अभी बात करना उचित नहीं लग रहा है। नटवर सिंह कहते हैं कि अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति बाइडन ने भारत के साथ बेहतर संबंधों का वादा किया है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि बाइडन पांच दशक पहले भारत आए थे। नटवर सिंह कहते हैं कि इसके साथ यह भी याद रखना जरूरी है कि घुटे राजनीतिज्ञ बाइडन के लिए पहले रूस, चीन, यूरोप समेत अन्य अंतरराष्ट्रीय मसले ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। भारत पांचवे नंबर पर आता है।

सर्गेई लावरोव के यह कहने का अर्थ क्या है?

पिछले पचास सालों से भारत को जब भी चीन से दिक्कत आती थी तो कूटनीतिक स्तर पर रूस साथ देता था। भारत की विदेश नीति को समझने वालों का स्पष्ट मानना है कि रूस हमेशा से भारत का पुराना सामरिक और विश्वसनीय साझीदार देश रहा है। लेकिन यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि राष्ट्रपति पुतिन प्रशासन में विदेश नीति के मास्टर विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने कुछ दिन पहले चीन विरोधी प्रचार अभियान में भारत के फंस जाने का वक्तव्य दे दिया था। इसके कई मायने निकाले जा रहे हैं, क्योंकि बदल रही भू-राजनीति में चीन, पाकिस्तान को लगातार रूस के करीब ले जाने में मजबूत भूमिका निभा रहा है। रूस और चीन के रिश्ते भी काफी करीबी बन रहे हैं।

जाते-जाते ऐसा क्यों कहकर जा रहे हैं माइक पोम्पियो?

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो दो सप्ताह बाद देश की सत्ता में नहीं रहेंगे? यह कार्यभार किसी और राजनेता को संभालना है, लेकिन अपने कार्यकाल की समीक्षा में उन्होंने विदेश सचिव एस जयशंकर से काफी करीबी दिखाई है। पिछले 15-20 साल का इतिहास देखें तो अमेरिका में हुए हर सत्ता के बदलाव में भारत के नेताओं और भारत से मधुर संबंधों को राष्ट्राध्यक्षों ने याद किया है। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी, जार्ज बुश ने मनमोहन सिंह, बराक हुसैन ओबामा ने मनमोहन सिंह को याद किया। ओबामा ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ गर्मजोशी दिखाई। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप का प्रशासन गर्मजोशी के साथ-साथ जितना हो पाया, चीन के साथ दुखती रग पर नमक मलकर सत्ता छोड़ रहा है।
अमेरिकी नेताओं के इस बयान से चीन की तिलमिलाहट साफ दिखाई दे रही है। शी जिनपिंग प्रशासन ने अमेरिका को कई बार भारत-चीन के रिश्ते, संबंध और मुद्दों से दूर रहने की हिदायत दी है।

क्यों महत्वपूर्ण है 20 जनवरी के बाद का समय?

बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद चीन को अमेरिका के साथ संबंधों की उम्मीद दिखाई पड़ रही है। बाइडेन उदारवादी राजनीति के भी पक्षधर हैं। उनके संकेतों से भी यही लग रहा है। इसके समानांतर ट्रंप प्रशासन में अमेरिका और चीन के रिश्ते बेहद तल्ख थे। भारत के संदर्भ में देखें तो लद्दाख में भारत-चीन तनाव के दौरान ट्रंप प्रशासन के हस्तक्षेप ने चीन को काफी मजबूर किया था। चीन ने सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर संवाद प्रक्रिया को महत्व देकर इसे शांतिपूर्ण ढंग से टालने की कोशिश की थी। वहीं अब चीन इसमें टाल मटोल कर रहा है। वह पांच सूत्रीय कार्यक्रम पर अमल करने की बात मानता है, लेकिन करता नहीं। इसे चीन की किसी गलत मंशा से भी जोड़ा जा रहा है।

बेजोड़ है जयशंकर, श्रंगला और डोभाल की तिकड़ी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमेशा अपनी एक रणनीति बनाकर चलते हैं। 2014 से उनके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को बनाए रखने में विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की बड़ी भूमिका रही है। इसमें कूटनीति के महारथियों में गिने जाने वाले एस जयशंकर को कमतर आंकना बड़ी भूल होगी। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन से बेहतर रिश्ते, 2017 तक के ट्रंप का 2019 तक हृदय परिवर्तन, हाउडी मोदी जैसे कार्यक्रम भारतीय कूटनीतिज्ञों की बहुत बड़ी जीत कही जा सकती है।

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पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर करने, डोकलाम विवाद के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक चर्चा की शुरुआत बड़ी बात है। एस जयशंकर के  उत्तराधिकारी पूर्व विदेश सचिव और चीन में भारत के राजदूत रहे विजय कृष्ण गोखले ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई थी। पीएमओ की टीम में गोपाल बाग्ले जैसे विदेश सेवा के अधिकारियों की सक्रियता को कहीं से कमतर नहीं आंका जा सकता। समझा जा रहा है कि भारत ऐसी आती-जाती चुनौतियों को चुटकियों में निबट लेगा।

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