अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल जीतने के लिए भाजपा आदिवासियों पर दांव लगाने जा रही है। इसकी वजह भी है। बीते पंचायत चुनावों में हिंसा और चुनावी धांधली के तमाम आरोपों के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा था और वह दूसरे स्थान पर रही थी।
उसके बाद पुरुलिया में अपने दो कार्यकर्ताओं की हत्या को भी भुनाने में पार्टी ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। बीते महीने पहले अमित शाह ने पुरुलिया में रैली की और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेदिनीपुर में रैली की। अमित शाह अगले महीने फिर बंगाल दौरे पर आने वाले हैं।
इसके अलावा पार्टी अब उत्तर बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी चाय मजदूरों को लुभाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। उसने न्यूनतम मजदूरी की मांग में आंदोलन का फैसला किया है।
इलाके की लोकसभा की दो और विधानसभा की एक दर्जन सीटों पर बागान मजदूरों के वोट ही निर्णायक हैं। इस साल मार्च में त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में आदिवासी इलाकों की 20 सीटों ने ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था।
पार्टी अब बंगाल में भी त्रिपुरा फॉर्मूले का इस्तेमाल करना चाहती है। उसने अगले साल होने वाले आम चुनावों को सेमी-फाइनल और वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों को फाइनल कहा है।
बंगाल के आदिवासी वोटर
पश्चिम बंगाल में आदिवासी दशकों से लेफ्ट फ्रंट का वोट बैंक रहे हैं। जलपाईगुड़ी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रहीं मालती विश्वास बताती हैं, "चाय बागानों में ट्रेड यूनियनों के जरिए मजबूत उपस्थिति की वजह से दशकों तक लेफ्ट फ्रंट की तूती बोलती रही है। लेकिन साल 2011 के चुनावों में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद इन इलाकों में समीकरण बदले हैं।"
"बागानों के लगातार बंद होने, मजदूरों में भुखमरी और आदिवासी इलाकों में विकास नहीं होने की वजह से बढ़ती माओवादी गतिविधियों से आदिवासियों का लेफ्ट फ्रंट से मोहभंग तो वर्ष 2006 के विधानसभा चुनावों से ही शुरू हो गया था।"
"चाय बागान मजदूरों और आदिवासियों के लिए एकमुश्त दर्जनों योजनाएं शुरू कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इन वोटरों का भरोसा हासिल किया था। लेकिन, अब तृणमूल के इस वोट बैंक में भाजपा सेंध लगाने लगी है।"