भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि सूबे में अकेले आगे बढ़ने से पार्टी की ताकत बढ़ेगी। चूंकि शिवसेना के एनसीपी-कांग्रेस से समझौता करने के बाद हिंदुत्व की राजनीति करने वाली वह सूबे में अकेली पार्टी बन गई है। एनसीपी-कांग्रेस के साथ शिवसेना को लगातार हिंदुत्व के मुद्दे पर सरकार बचाने के लिए समझौते करने होंगे, जबकि भाजपा ऐसे मुद्दों को लगातार हवा देगी। वैसे भी लोकसभा और विधानसभा के दो-दो चुनावों में शिवसेना से अधिक वोट और सीट ला कर उसने राज्य में खुद के बड़ा भाई होने की धारणा बना दी है। बीते विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव मैदान में उतर कर पार्टी सबसे अधिक सीट जीत चुकी है।
सरकार लंबी चली तो बढ़ेगी परेशानी
रणनीतिकारों का यह भी मानना है कि अगर सरकार चलाने में विवाद नहीं हुआ और कार्यकाल लंबा खिंचा तो भाजपा के लिए मुश्किलें आ सकती हैं। पूरे कार्यकाल तक सरकार चलने पर तीनों दल अगले चुनाव में सीट बंटवारे का फार्मूला भी निकाल लेंगे। इससे तीनों दलों की संयुक्त ताकत भाजपा पर भारी पड़ सकती है।
नेतृत्व परिवर्तन पर नहीं झुकी भाजपा
शिवसेना से मतभेद के दौरान एक अवसर ऐसा भी आया था जब दोनों दलों के बीच समझौता हो सकता था। शिवसेना ने नेतृत्व परिवर्तन की शर्त पर सीएम पद नहीं मांगने का संकेत दिया था। हालांकि भाजपा नेतृत्व ने शिवसेना की मांग को ठुकरा कर अगले आगे बढ़ने का फैसला किया।