देश की राजधानी दिल्ली में बुधवार सुबह-सुबह अच्छी बारिश हुई। इससे राजधानी तर-बतर हो गई। जगह-जगह जलभराव दिखाई दिया और लोगों को आवाजाही में काफी परेशानी हुई। कुछ ही दिन पहले इसी तरह की तस्वीरें अमेरिका और चीन में भी दिखाई पड़ी थीं, जहां सड़कों से लेकर बाजारों और मॉल तक में भारी जलभराव होते हुए देखा गया था। जब भी शहरों में ऐसी बाढ़ आती है तो विपक्ष के साथ-साथ आम लोग भी इसके लिए स्थानीय सरकार और प्रशासन की नाकामी को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन क्या शहरों की इस बाढ़ को पूरी तरह रोकना संभव है?
दरअसल, अब तक यही माना जाता था कि शहरों की नालियों-नालों की सही तरीके से सफाई (डिसिल्टिंग) न होने के कारण बारिश का पानी सड़कों पर भर जाता है। लोग यही मानते थे कि नालों की सही तरीके से सफाई होने के बाद ऐसी बाढ़ को रोका जा सकता है। लेकिन अमेरिका और चीन जैसे शहरों में, जहां स्थानीय प्रशासन और सरकार अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों के लिए काफी सतर्क रहते हैं, बारिश के दौरान आ रही बाढ़ ने इस सोच को काफी हद तक प्रभावित किया है। अब तक का अनुभव बताता है कि नालियों-नालों की सफाई से बाढ़ की समस्या को कमजोर तो किया जा सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
कांक्रीटीकरण जिम्मेदार
शहरों में बारिश के पानी से आ रही बाढ़ के लिए शहरों का कांक्रीटीकरण सबसे अधिक जिम्मेदार माना जाता है। पक्के भवनों, गलियों, सड़कों, बाजारों और मॉल्स तक के निर्माण में हर जगह जमीन को पक्का कर दिया जाता है जिससे पानी रिसकर नीचे नहीं पहुंच पाता। यह पानी ऊपर ही बहता रहता है जिससे बाढ़ की स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन क्या केवल इसी कारण शहरों में बाढ़ आती है?
बिना कांक्रीटीकरण गांवों में बाढ़ क्यों
गांवों का अनुभव बताता है कि यहां अभी कांक्रीटीकरण न के बराबर ही है। ज्यादातर खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी-तालाब कांक्रीटीकरण से मुक्त हैं। लेकिन इसके बाद भी अच्छी बारिश हो जाने के बाद कई इलाकों में लंबे समय तक पानी जमा रहता है। मिट्टी में रिसकर पानी नीचे पहुंचने के बाद भी कई खेतों, गांवों में हफ्ते-पंद्रह दिनों तक पानी भरा रहता है। असम-बिहार के हजारों गांव बिना किसी कांक्रीटीकरण के लंबे समय तक बाढ़ और जलभराव का सामना करते हैं। यदि केवल कांक्रीटीकरण ही बाढ़ और जलभराव होने का एकमात्र कारण होता तो खेतों और गांवों में तो बाढ़ बिल्कुल नहीं आनी चाहिए थी। लेकिन इनमें भी पानी भर रहा है। फिर शहरों में बाढ़ का कारण क्या है, और इसका समाधान क्या है?
कांक्रीटीकरण बाढ़ का अंतिम कारण नहीं
शहरी मामलों के विशेषज्ञ और वॉटर मैनेजमेंट के विशेषज्ञ श्रेष्ठ तायल ने अमर उजाला से कहा कि शहरों आ रही बाढ़ को हमें कई अलग-अलग नजरिये से देखना होगा। कांक्रीटीकरण शहरी बाढ़ का एक प्रमुख कारण है। इससे पानी रिसकर नीचे नहीं पहुंच पाता और सड़कों पर बिखर जाता है। नालियों-नालों की डिसिल्टिंग से इसे कम किया जा सकता है। लेकिन ऐसा करके भी शहरी इलाकों की बाढ़ को पूरी तरह नहीं रोका जा सकता। इसका बड़ा कारण यह है कि एक बार में अधिक पानी बरसने से नालियों-नालों की जल वहन करने की क्षमता समाप्त हो जाती है, ऐसे में सड़कों पर पानी का बिखरना या बाढ़ आना तय है।
छोटे-छोटे जल संभर निकाय सबसे बेहतर उपाय
पर्यावरणीय अध्ययन के लिए प्रसिद्ध संस्थान टेरी के फेलो रह चुके श्रेष्ठ तायल ने कहा कि नालियों-नालों की जल वहन करने की क्षमता सीमित है। लेकिन यदि शहरी इलाकों-कॉलोनियों में जगह-जगह छोटे-छोटे जल संभर निकाय (Watershed Bodies) विकसित किए जाएं तो ये बारिश के पानी को रोकने में बहुत मददगार साबित होंगे। इनके माध्यम से वर्षाजल नीचे पहुंचने पर शहरों का वाटर टेबल भी ऊपर आएगा। इस जल को पीने के साथ-साथ अन्य कार्यों के लिए भी उपयोग किया जा सकता है।
हाईवे से शहरों को बड़ा नुकसान
बड़े ऊंचे और लंबे-लंबे हाइवे अब अच्छी अर्थव्यवस्था वाले देशों-शहरों की पहचान बन चुके हैं। माना जाता है कि कोई भी देश उतना ही विकास करेगा, जितनी उसकी सड़कें अच्छी होंगी। इस सोच से प्रभावित होकर भारत सहित दुनिया के तमाम देश अपने यहां ऊंचे और लंबे-लंबे हाई वे बना रहे हैं। लेकिन ये हाईवे प्राकृतिक जल बहाव को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।
प्राकृतिक जल प्रवाह को रोक रहे हाईवे
दरअसल, इन हाईवे को हर मौसम में इस्तेमाल करने लायक बनाने के लिए इनके निर्माण में खूब मजबूती दी जा रही है। पानी से सड़कों की मजबूती को सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। इसलिए एक रणनीति के अंतर्गत यथासंभव इन सड़कों से पानी के स्तर को नीचे रखने का प्रयास किया जाता है। इसके लिए जमीन के 10 से 20 फीट नीचे तक खुदाई करके उनमें कंक्रीट और लोहे की रॉड डाली जा रही हैं। इससे सड़कें मजबूत बनती हैं और ऊपरी सड़क पानी के बहाव से बची रहती है। लेकिन ये हाईवे जिन रास्तों से होकर गुजरते हैं, वहां नीचे तक कंक्रीट की एक मोटी दीवार खड़ी हो जा रही है। इससे जल बहाव का प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो रहा है और एक तरफ का बारिश का पानी दूसरी तरफ नहीं जा पा रहा है। यह भी शहरों में बाढ़ का बड़ा कारण बन रहा है।
गुरुग्राम में बाढ़ का बड़ा कारण दिल्ली-जयपुर हाईवे
दिल्ली-जयपुर हाईवे गुरुग्राम में आ रही बाढ़ का बड़ा कारण साबित हुआ है। हाईवे के निर्माण से आने वाली इस परेशानी का अब तक बिल्कुल अध्ययन नहीं किया गया था। अब इन बाढ़ों ने इंजीनियरों-पर्यावरणविदों को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि ऐसे में हाईवे के निर्माण में क्या बदलाव किया जाए जिससे उनकी मजबूती के साथ-साथ प्राकृतिक जल प्रवाह का मार्ग प्रभावित न हो।
मिट्टी की प्रकृति और जल स्तर गांवों में बाढ़ के कारण
गांवों में यदि जल का स्तर ऊपर है तो उनकी मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता बहुत कम होती है। ऐसे इलाकों में बारिश का पानी लंबे समय तक जमा रह सकता है। इसी तरह दोमट या काली मिट्टी, जिनकी जल धारण करने की क्षमता बहुत अच्छी होती है, उन इलाकों में भी पानी का भराव लंबे समय तक बना रहता है। लेकिन जिन इलाकों में बलुई मिट्टी होती है, या पठारी क्षेत्र होता है, वहां पानी का भराव लंबे समय के लिए नहीं होता। लेकिन शहरी क्षेत्रों में हर कॉलोनी और हर इलाके में छोटे-छोटे जल संभरण निकाय बनाकर और नालियों-नालों की समय-समय पर डिसिल्टिंग करके बारिश की बाढ़ की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हर उपाय की सीमा
लेकिन इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पर्यावरणीय बदलाव के कारण किसी एक सीमित क्षेत्र में बहुत कम समय में बहुत अधिक बारिश होने से कोई भी व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। हाल के वर्षों में मुंबई में एक ही दिन में कई इलाकों में 200 मिमी से 295 मिमी से अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई हैं। ऐसी भारी बारिश में कोई भी व्यवस्था अप्रभावी साबित हो सकती है।