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जीएसटी के पांच सवाल, कौन देगा इनके जवाब?

Sun, 02 Jul 2017 09:13 AM IST
प्रोफेसर अरुण कुमार
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- फोटो : GETTY IMAGES
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जीएसटी में सभी अप्रत्यक्ष करों को एक जगह ला दिया गया है। ये वो सरलीकरण है जिसके बारे में सरकार बात कर रही है। लेकिन सवाल उठता है कि ये लागू कैसे होगा। जीएसटी पूरी तरह से एक कंप्यूटरीकृत व्यवस्था है। अगर ये कंप्यूटराइज्ड नहीं होता है तो ये लागू नहीं हो सकता है। कंप्यूटराइजेशन में कई तरह की दिक्कतें हैं जो अब सामने आ रही हैं। इसे लेकर व्यापारी तबका और छोटे उद्योगों से जुड़े लोगों का विरोध भी हो रहा है। इसमें यही बात खास है कि सभी कर एक साथ लाए जा रहे हैं।
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एक राष्ट्र, एक टैक्स सचमुच?
सरकार एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक बाजार की बात कर रही है। इसमें जीरो के अलावा टैक्स के चार स्लैब बनाए गए हैं। तो ये एक टैक्स कैसे हुआ जिसमें चार अलग-अलग दर से टैक्स लग रहा है? इसमें एक टैक्स का मतलब ये हुआ कि एक चीज पर सारे देश में एक ही टैक्स लगेगा। अभी तक हर प्रांत अपना टैक्स अलग निर्धारित करते थे। आपने अगर कार खरीदी तो हरियाणा में टैक्स कुछ और होगा, उत्तर प्रदेश में कुछ और होगा। नई व्यवस्था में एक कार पर सारे देश में एक ही कर लगेगा। लेकिन मेरा मानना है कि इस बात को बढा-चढाकर पेश किया जा रहा है। ऐसा नहीं था कि पहले देश एक नहीं था और अब टैक्स रेट एक हो जाएगा तो देश एक हो जाएगा। ये सवाल सही है कि चार-पांच टैक्स स्लैब के साथ सेस को जोड़ दें तो छह टैक्स स्लैब हो जाते हैं। ये बात जीएसटी को और जटिल बनाती है। हालांकि सरकार ये कह रही है कि धीरे-धीरे जीएसटी को दो या तीन टैक्स स्लैब पर लाया जाएगा।

व्यापारियों के विरोध की वजह?

देश भर से जीएसटी के जश्न की तस्वीरें भी आ रही हैं तो कहीं-कहीं व्यापारी विरोध और भूख हड़ताल भी कर रहे हैं। जीएसटी के विरोध या समर्थन की वजह समझने के लिए इसकी डिजाइन को समझना जरूरी है। जीएसटी बड़े पैमाने पर चलने वाले उद्योग को मदद करता है। लेकिन हमारे देश में लार्ज स्केल इंडस्ट्री के अलावा मंझोले और लघु उद्योग भी हैं, साथ ही कुटीर उद्योग भी है। इन सभी सेक्टर्स की जरूरतें अलग-अलग हैं। चूंकि इस टैक्स को बडे उद्योगों के लिए लाया गया है तो मंझोले, छोटे और कुटीर उद्योगों को इससे धक्का लगने वाला है। प्रभावित होने वाले ऐसे लोग इसका विरोध कर रहे हैं। बडे उद्योगों को इससे फायदा होने वाला है, इस वजह से वे इसका समर्थन कर रहे हैं। भारत ऐसा देश है जहां लोगों के हितों में भी भारी विविधता है, इसलिए कोई इसका समर्थन कर रहा है तो कोई इसका विरोध।

किसानों को क्या फायदा, कितना नुकसान?
खाद्यान्न पदार्थों पर तो जीएसटी लागू नहीं है, लेकिन इसके इनपुट्स जैसे उर्वरक, कीटनाशक जैसी चीजों पर टैक्स लगेगा। इस वजह से खेती में आने वाला खर्च थोडा-बहुत बढ़ सकता है। जीएसटी आने से कृषि की उत्पादकता पर कोई फर्क पड़ता तो जरूर फायदा होता, लेकिन इससे न तो कोई खास फायदा है और न कोई बड़ा नुकसान। 

पेट्रोल और डीजल जीएसटी में नहीं?

पेट्रोल और डीजल से राज्य बहुत ज्यादा राजस्व प्राप्त करते हैं। उनको लगता है कि ये चीजें जीएसटी के दायरे में आ गईं तो उनकी आमदनी कम हो जाएगी। उन्हें लगता है कि उन्हें जब भी राजस्व की जरूरत होगी, वे इस टैक्स के जरिए और टैक्स ले सकते हैं। राज्यों को ये डर भी है कि जीएसटी से उनका टैक्स मिलना कम हो सकता है और केंद्र सरकार इसकी किस हद तक भरपाई करेगी, ये तय नहीं है। इस वजह से राज्य सरकारें पेट्रो गुड्स के मामले में अपनी स्वायत्तता खोना नहीं चाहती हैं।

एक राष्ट्र, एक बाजार में कश्मीर नहीं
हमारे देश में संघीय ढांचा अपनाया गया है। संविधान में राज्यों को एक स्वायत्तता दी गई है। जीएसटी व्यवस्था राज्यों की स्वायत्ता को खत्म कर रही है। हिमाचल प्रदेश की जरूरतें तमिलनाडु से अलग हैं। असम और गुजरात भी अलग-अलग जरूरतों वाले राज्य हैं। पुरानी टैक्स व्यवस्था में हर राज्य के लिए ये मौका था कि वे अपनी जरूरतों के मुताबिक टैक्स का फैसला करें। इसीलिए विकेंद्रीकरण की बात होती है। नई व्यवस्था में ये बात खत्म हो रही है। जीएसटी में स्थानीय निकायों की आमदनी का रास्ता भी बंद हो गया है। उनके लिए क्या व्यवस्था की गई है, ये अभी पता नहीं है। कश्मीर के सवाल को आप वित्तीय संघवाद के बड़े सवाल से जोड सकते हैं। एक तो उन्हें स्पेशल स्टेटस मिला हुआ है और दूसरा वे फिस्कल फेडरेलिज्म का मुद्दा उठा रहे हैं।
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तीन बड़ी दिक्कतें

नीति आयोग के सदस्य और अर्थशास्त्री विवेक देबरॉय ने कहा है कि इससे जीडीपी नहीं बढने वाला है। शुरू में ये सोचा गया था कि एक या दो टैक्स स्लैब होंगे, लेकिन अभी ये छह हैं। अगर ये आदर्श रूप में होता तो जीडीपी एक से दो फीसदी तक बढ़ सकती थी।

अब समस्या ये आ रही है कि पांच टैक्स स्लैब में किस वस्तु को कहां रखना है, किससे कितना टैक्स कमाना है। दूसरी समस्या ये है कि किसी वस्तु को गलत स्लैब में रखे जाने की गलती हो सकती है। इससे काले धन को बढावा मिल सकता है। तीसरी समस्या ये है कि अगर छोटे उद्योग ठप होते हों तो बेरोजगारी बढ़ने का खतरा है।
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