मालूम हो कि तीन तलाक का मुद्दा बीते साल 2017 में सबसे ज्यादा सुर्खियां में रहा। साल 2017 के अगस्त माह में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित कर ऐतिहासिक फैसला दिया।
तीन तलाक मामले को उत्तराखंड की शायरा बानो ने कोर्ट में चुनौती दी थी। पति द्वारा दहेज उत्पीड़न के बाद जबरदस्ती मायके भेजे जाने और फिर तलाक दिए जाने के बाद शायरा बानो ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपनी याचिका के माध्यम से उन्होंने ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ एप्लीकेशन एक्ट’, 1937 की धारा 2 को संवैधानिक चुनौती दी। शायरा ने मुस्लिम समाज में व्याप्त बहुविवाह, तीन तलाक और निकाह-हलाला जैसी कुरीतियों को खत्म करने की अपील की थी।
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों की एक संवैधानिक पीठ ने बहुविवाह और निकाह-हलाला पर अभी कोई फैसला न लेकर, अपनी सुनवाई को सिर्फ तीन तलाक तक ही सीमित रखा।
अदालत के इस फैसले पर मुस्लिम महिला संगठनों, ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड आदि संगठनों ने खुशी जाहिर की। लेकिन दारुल उलूम देवबंद आदि कुछ संस्थाओं ने इसे भाजपा का राष्ट्रवादी एजेंडा बताते हुए इसका विरोध किया।
तीन तलाक पर मोदी सरकार को ऐतिहासिक फतह हासिल हुई, लोकसभा में कई संशोधन प्रस्ताव खारिज होने के बाद केंद्र का 'मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन मैरिज बिल' पास हुआ। हालांकि राज्यसभा में अभी तक यह तीन तलाक बिल पास नहीं हो सका जिसकी वजह से यह अभी कानून की शक्ल नहीं ले पाया है।
दिसंबर में केंद्रीय कैबिनेट ने तीन तलाक की प्रथा को अपराध घोषित करने वाले एक विधेयक को मंजूरी दी। इस विधेयक के मुताबिक मौखिक, लिखित, वॉट्सएप, ईमेल और एसएमएस सहित सभी तरीकों से दिये जाने वाले तलाक को अपराध माना गया है। इसके लिए तीन साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
नई हज नीति के तहत अकेली महिला को बिना मेहरम (पुरुष रिश्तेदार) के हज यात्रा की इजाजत देने का पहला बड़ा फैसला लिया। अब 45 साल और उससे अधिक उम्र की महिलाएं बिना किसी पुरुष साथी के हज पर जा सकेंगी। अल्पसंख्यक मंत्रालय की नई हज पॉलिसी के तहत जिसमें 45 साल से अधिक उम्र की चार महिलाओं का समूह बिना पुरुष साथी यानी महरम के हज यात्रा पर जा सकेंगी।
अभी तक की नीति में 45 साल से कम उम्र की महिलाएं बिना पुरुष साथी के हज पर नहीं जा सकती थी वहीं नीति में पुरुष साथी का कोटा भी 200 से बढ़ाकर 500 किया गया है। कई इस्लामिक देशों में जहां महिलाओं के लिए इस तरह की पाबंदी नहीं है फिर क्यों भारतीय महिलाओं के लिए इस तरह की पाबंदियां रहें? बता दें कि प्रस्तावित हज नीति साल 2012 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक तैयार की गई है।
यूपी की भाजपा सरकार के मदरसों में राष्ट्रगान गाए जाने के फैसला भी काफी सुर्खियों में बना रहा। योगी सरकार के इस फैसले का राजनीतिक तौर पर जमकर विरोध हुआ। विपक्ष ने योगी सरकार के इस फैसला का कड़ा विरोध किया।
देशभर में यूपी सरकार के इस फैसले पर खूब चर्चा हुई। मदरसों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता के योगी सरकार के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई मगर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।मदरसों में राष्ट्रगान गाने की अनिवार्यता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान करना हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है।
इतना ही नहीं कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रगान राष्ट्रीय अखंडता, पंथ निरपेक्षता और लोकतांत्रिक भावना का प्रसार करता है। इसी प्रकार से राष्ट्रध्वज कपड़े और स्याही से बना एक टुकड़ा मात्र नहीं है, यह स्वाधीनता के लक्ष्य को हासिल करने का जरिया है। राष्ट्रगान गाना और राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराना सभी शिक्षण संस्थाओं और अन्य संस्थाओं में अनिवार्य है।