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बाबरी विवाद के वो 5 किस्से जिनसे दहल उठा था पूरा देश

Wed, 19 Apr 2017 11:09 AM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
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- फोटो : SELF
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सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई के बीच अयोध्या में बाबरी मस्जिद और राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर दोतरफा सुनवाई कर रही है, पहली ढांचा विध्वंस के आरोपियों पर आरोप तय करने और दूसरा राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के स्‍थायी हल के लिए।
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ऐसे में भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्‍ण आड़वाणी और मनोहर जोशी पर अभी भी आरोपों की तलवार लटकी है, तो ये तय होना भी मुश्किल दिख रहा है कि अयोध्या में विवादित स्‍‌थल पर असली हक किसका है। बाबरी मस्जिद मुद्दे की व्याख्या देश के सबसे संवदेनशील मुद्दे के तौर पर की जाती है जिसने पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक विभाजन की एक बड़ी रेखा खींच दी।

पूरे विवाद के दौरान कई ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। ऐसी ही चंद घटनाओं पर हम डालते हैं निगाह, आप भी पढ़िए। 

1985 प्रधानमंत्री ने खुलवाया था बाबरी मस्जिद का ताला

एक सदी से चले आ रहे बाबरी विवाद को सबसे बड़ी हवा मिली पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में। 1985 में राजीव ने विवादित स्‍थल का ताला खुलवाकर वहां पुजारियों को पूजा पाठ की अनुमति दे दी। कहा जाता है कि राजीव गांधी ने जीवन में दो बड़ी गलतियां की, पहली शाहबानो मामले में अदालत के फैसले को पलटने के लिए नया मु‌स्लिम कानून लाना और दूसरा विवादित बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खुलवाना।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में भी इस घटना का जिक्र किया है। परिसर का ताला खुलने के बाद ही हिंदू संगठनों के हौसले बुलंद हुए और उन्होंने विवादित स्‍थल पर मंदिर बनाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया।

जब लालू ने रोका आडवाणी का रथ

- फोटो : SELF
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के संकल्प के साथ ही पूरे देश में हिंदू अलख जगाने के लिए तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्‍ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक रथ यात्रा शुरू की। यह यात्रा जहां जहां से गुजरती हिंदू पूरे जोश खरोश से इसका स्वागत करते। कई जगह इस दौरान दंगे भी भड़के और कई लोगों की मौत भी हुई।

इसी बीच यात्रा जब  23 अक्तूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर पहुंची तो सूबे के नए नवेले मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उसे रुकवाकर आडवाणी को गिरफ्तार करवा दिया। इससे उनके समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं का आक्रोश उबल उठा।

इस घटना ने हिंदू संगठनों को एकजुट और मुखर होने का मौका दे दिया। कहा जाता है कि रथयात्रा रोककर लालू यादव ने हिंदू ज्वार और मंदिर आंदोलन की आग को और भड़का दिया। वहीं भाजपा ने भी केंद्र की वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार को गिरा दिया। इससे सरकारें कमजोर हुई और आंदोलन मजबूत।

 

जब मुलायम ने चलवाई कार सेवकों पर गोलियां

रथयात्रा के साथ ही अयोध्या में कार सेवकों का जुटना शुरू हो गया था। 1990 में यह सिलसिला और तेज हुआ और विवादित स्‍थल के आसपास हर समय हजारों की संख्या में देशभर से आए कार सेवक जुटे रहते। जिसके चलते कई बार टकराव की भी आशंका रहती।

इसी बीच एक घटना ने पूरे देश को दहला कर रख दिया। 30 अक्टूबर 1990 को यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने आक्रोशित कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया जिसमें 16 लोगों की
जान चली गई। इस घटना से देशभर के हिंदुओं में उबाल आ गया।

वहीं गठबंधन की बैशाखी के सहारे चल रही मुलायम सिंह की सरकार भी गिर गई। 1991 में हुए चुनावों में भाजपा ने यूपी में अपनी सरकार बनाई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री चुने गए। प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद राम मंदिर आंदोलन को और हवा मिलने लगी।

विनय कटियार के घर हुई बैठक में तय हुआ विध्वंस का प्लान

अयोध्या में ‌विवादित ढांचा जिसे बाबरी मस्जिद कहा जाता है उसे देशभर से लाखों की संख्या में आए कारसेवकों ने छह दिसंबर 1992 को ढहा दिया गया। इस घटना ने पूरे देश का सामाजिक ताना बाना‌ झिंझोड कर रख दिया। इस घटना के विरोध में देश में कई जगह दंगे हुए जिनमें सैकडों लोग मारे गए।

बताया जाता है ढांचा विध्वंस की पूरी साजिश उस समय फायर ब्रांड नेता और बजरंग दल के संस्‍थापक विनय कटियार के घर पर रची गई थी। जिसमें लाल कृष्‍ण आडवाणी, उमा भारती और अशोक सिंघल जैसे नेता मौजूद थे। इस गोपनीय बैठक में इस बात पर मुहर लगी कि कल यानि 6 दिसंबर को विवादित ढांचे को ढहा दिया जाएगा। हाइकोर्ट में दायर चार्जशीट में भी सीबीआई ने इस बात का जिक्र किया था। 
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जब बर्खास्त हुई कल्याण सिंह की सरकार

- फोटो : कल्याण सिंह
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। विध्वंस के तुरंत बाद कल्याण सिंह ने सूबे के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं इस घटना के बाद नींद से जागी केंद्र सरकार ने आनन फानन में कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया।

बताया जाता है कि केंद्र ने उस समय भाजपा के नेतृत्व में तीन और अन्य राज्यों में चल रही सरकारों को एक साथ बर्खास्त कर दिया गया था। केंद्र की इस कड़ी कार्रवाई को उस समय अल्पसंख्यक समुदाय
का गुस्सा थामने के लिए उठाया गया कदम बताया गया था। वहीं केंद्र के इस कदम से हिंदुओं में आक्रोश और बढ़ गया।

जिसके बाद मंदिर आंदोलन की आग और तेज हो गई। इसका नतीजा ये रहा कि इस घटना के तुरंत बाद हुए चुनावों में भाजपा चारों राज्यों में एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और चार साल
बाद हुए लोकसभा चुनावों में भी पार्टी ने देश में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। 
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