डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि काउंसिल आफ साईंटिफिक एंड इंडस्ट्रीयल रिसर्च (सीएसआईआर) ने बिना कडुवाहट वाली स्टीविया की नई वेरायटी विकसित की है। यह वेरायटी दुनिया को भारत की देन है।
सीएसआईआर के साथ मां दंतेश्वरी हर्बल लिमिटेड ने दो करार किए हैं। वाड़ा और दंतेवाड़ा में इस नई वेरायटी की खेती के साथ ही सीएसआईआर स्टीविया की पत्तियों से चीनी तैयार करने की तकनीक भी मुहैया कराएगी।
डायबिटीज और मोटापे में अमृत समान है मीठी तुलसी
स्टीविया मूलरूप से पेराग्वे का पौधा है। दुनियाभर में यह चीनी का विकल्प बन रहा है। शून्य कैलोरी के कारण स्टीविया शूगर और मोटापे के मरीजों के लिए अमृत समान है।
डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि जापान में चीनी के विकल्प के तौर पर स्टीविया का इस्तेमाल 61 फीसदी तक पहुंच गया है। छत्तीसगढ़ के कोंडागाव में इसकी खेती शुरू हुई है। स्टीविया की पत्तियां बाजार में पांच से 6 हजार रुपये किलो बिकती हैं। भारत में स्टीविया को मीठी तुलसी के नाम से जाना जाता हैं।