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SC Updates: सुप्रीम कोर्ट ने पटाखा फैक्ट्री विस्फोट मामले में NGT का आदेश किया रद्द, भागलपुर डीएम को बड़ी राहत

Wed, 05 Mar 2025 04:34 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Firecrackers Unit Blast: देश की सर्वोच्च अदालत ने बिहार के भागलपुर जिले में साल 2022 में हुए पटाखा फैक्ट्री विस्फोट के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। बता दें कि, सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एनजीटी के आदेश को रद्द कर दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें भागलपुर के जिलाधिकारी (डीएम) को पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में मारे गए लोगों के परिजनों को 20 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस अभय ओका और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि एनजीटी ने यह आदेश जारी करने से पहले न तो दोषियों को कोई नोटिस दिया और न ही मरने वालों और घायलों के परिवारों से कोई जवाब मांगा।
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फिर से एनजीटी के पास भेजा गया मामला
अब यह मामला फिर से विचार करने के लिए 28 मार्च को एनजीटी के पास भेजा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी को निर्देश दिया है कि वह भागलपुर जिलाधिकारी को नोटिस जारी करे और मृतकों व घायलों के परिवारों का पता लगाए।  

क्या था पूरा मामला?  
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 27 मई 2022 को एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर इस विस्फोट का संज्ञान लिया था, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई थी। एनजीटी ने कहा था कि यह पटाखा फैक्ट्री पर्यावरण नियमों और खतरनाक रसायन नियम, 1989 और विस्फोटक नियमों का उल्लंघन करके चलाई जा रही थी।  
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एनजीटी ने डीएम को दिया था मुआवजा देने का आदेश
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा था कि मृतकों के परिजनों को 20 लाख रुपये और घायलों को 15 लाख रुपये मुआवजे के रूप में दिए जाएं। यह राशि जिलाधिकारी को एक महीने के भीतर मृतकों व घायलों के परिवारों को देनी थी।  हालांकि, राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने यह भी कहा था कि सरकार यह पैसा कानूनी प्रक्रिया के तहत दोषियों से वसूल सकती है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह मामला फिर से एनजीटी के पास जाएगा, जहां नए सिरे से विचार किया जाएगा।

निवारक हिरासत एक कठोर उपाय- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत एक कठोर उपाय है। शीर्ष अदालत ने नगालैंड में मादक पदार्थ मामले में हिरासत में लिए गए दो लोगों के खिलाफ जारी हिरासत आदेश को निर्धारित सुरक्षा उपायों के अभाव में रद्द कर दिया। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि अधिकारियों ने बिना किसी विवेक का प्रयोग किए हिरासत में रखने का आदेश दिया। पीठ ने गौहाटी हाईकोर्ट के आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसने अशरफ हुसैन चौधरी और उनसकी पत्नी अडालिउ चावांग की हिरासत आदेश के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी थी। इन दोनों के खिलाफ 1988 के नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम में अवैध तस्करी की रोकथाम की धारा 3 (1) के तहत हिरासत आदेश जारी किया गया था।

पीठ ने कहा, निवारक हिरासत एक कठोर उपाय है। इसके तहत किसी ऐसे व्यक्ति को, जिस पर किसी दंडात्मक कानून के तहत मुकदमा नहीं चलाया गया है और जिसे दोषी नहीं ठहराया गया है, एक निश्चित अवधि के लिए हिरासत और कारावास में रखा जा सकता है, ताकि उस व्यक्ति की संभावित आपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लगाया जा सके।

पीठ ने आगे कहा कि निवारक हिरासत को संविधान के अनुच्छेद 22(3)(बी) के जरिये मंजूरी दी गई है। लेकिन अनुच्छेद 22 में निवारक हिरासत को प्रभावित करते समय पालन किए जाने वाले कड़े मानदंड भी दिए गए हैं। अनुच्छेद 22 में संसद की ओर से निवारक हिरासत से संबंधित शर्तों और तौर-तरीकों को निर्धारित करने के लिए कानून बनाने की बात कही गई है। 1988 का अधिनियम एक ऐसा कानून है जिसे संसद की ओर से पारित किया गया था, जिसमें निवारक हिरासत को अधिकृत किया गया था ताकि मादक पदार्थों और साइकोट्रोपिक पदार्थों की तस्करी पर अंकुश लगाया जा सके। पीठ ने नागालैंड सरकार के गृह विभाग के विशेष सचिव की ओर से पारित और बढ़ाए गए 30 मई, 2024 के नजरबंदी आदेशों को रद्द कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज में उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना मकानों को ध्वस्त करने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह कार्रवाई चौंकाने वाली है और गलत संकेत भेजती है।

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राज्य और जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्षों व सदस्यों को वेतन देने का सुप्रीम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को राज्य और जिला उपभोक्ता विवाद समाधान आयोगों (डीसीडीआरसी और एससीडीआरसी) के अध्यक्षों और सदस्यों को वेतन और भत्ते देने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत डीसीडीआरसी और एनसीडीआरसी के अध्यक्षों और सदस्यों के वेतन और भत्ते के भुगतान से जुड़े कई मामलों पर विचार कर रही थी।ढजस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि अगर भारत सरकार कोई समाधान नहीं निकालती है, तो अदालत भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने पर विचार करेगा। मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी।  
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