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देश की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी भाकपा के सामने रोजाना का खर्च उठाने की चुनौती

Sat, 10 Nov 2018 04:57 AM IST
शरद गुप्ता, नई दिल्ली
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कांग्रेस के बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (भाकपा) संकट में है। देश के सात राष्ट्रीय दलों में से एक भाकपा के सामने राजनीतिक अस्तित्व बचाने की चुनौती तो है ही, आर्थिक संकट भी मुंह बाए खड़ा है। जहां एक ओर सत्तारूढ़ भाजपा को पिछले एक साल में 1030 करोड़ रुपये चंदा मिला, वहीं भाकपा को अपना रोजाना का खर्च उठाना भी भारी पड़ रहा है।

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भाकपा का जन्म 1925 में हुआ था। उसी वर्ष डॉ. हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। 1969 में इंद्रप्रस्थ एस्टेट में उसने एक तीन मंजिला इमारत में अपना राष्ट्रीय कार्यालय ‘अजय भवन’ स्थापित किया। कभी अजय भवन देर रात तक गुलजार रहता था। 

आखिर भाकपा सांसद इंद्रजीत गुप्त संयुक्त मोर्चा सरकार में गृह मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय संभालते थे और पार्टी के सेक्रेटरी जनरल एबी बर्धन यूपीए- एक गठबंधन की अहम कड़ी थे। चतुरानन मिश्र, अजय घोष, भूपेश गुप्त, गीता मुखर्जी जैसे जाने-माने नेता पार्टी का चेहरा रहे। 

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62 कमरों की इमारत में आज केवल चार कर्मचारी

आज अजय भवन किसी भूतिया बंगले सा दिखता है। 62 कमरों वाली इस इमारत में आज केवल चार नियमित कर्मचारी हैं। कैंटीन बंद पड़ी है क्योंकि कोई आता जाता ही नहीं है। एक-दो केंद्रीय पदाधिकारी ही नियमित रूप से बैठते हैं। पदाधिकारी अपने लिए तो खुद ही चाय-कॉफी बना लेते हैं।

अजय भवन के 42 कमरों में अटैच्ड टॉयलेट है। इनमें से 16 कमरों में 72 लोगों के रहने का इंतजाम है। 14 कमरों में चार बेड हैं और दो में आठ-आठ लोग रुक सकते हैं। तीसरी मंजिल पर बड़ा हॉल है। जबकि भूतल पर लाइब्रेरी, कैंटीन और बुकशॉप है। बिल्डिंग में दो लिफ्ट लगी है। केवल बिजली-पानी का महीने का बिल ही दो लाख रुपये का आता है। 

नियमित कर्मचारियों की तनख्वाह और 40 पूर्णकालिक नेताओं को 13000 रुपये प्रतिमाह भत्ते का बोझ अलग से। एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राजनीतिक वजूद सिमटने के साथ  हमारी आय भी घटती जा रही है। अब हम अपना रोजमर्रा का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। किसी तरह से पार्टी चल पा रही है।
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कभी 29 लोकसभा सांसद थे, अब एक है

1962 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने 10 फीसदी वोट प्राप्त करते हुए 29 सीटें जीती थीं। 956 में उसे 27 सीटें मिली थीं। 1967 और 1971 के चुनाव में भी उसे 23-23 सीटें मिली थीं। पिछले लोकसभा चुनाव में वह 21 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 67 सीटों पर लड़ी पर केवल एक सीट ही जीतने में सफल हुई। मत प्रतिशत भी 0.8 रह गया। राज्यसभा में भी उसका केवल एक ही सांसद है।

छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का तमगा 
कभी त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और केरल में शासन करने वाली पार्टी अब 19 विधायकों के साथ केरल की पिनराई विजयन सरकार में जूनियर पार्टनर है। 2014 चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने उसे राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता खत्म करने का नोटिस दिया था। 

लेकिन 2016 में आयोग ने अपने नियमों को बदलते हुए पांच के बजाए दस साल के बाद मान्यता खत्म करने का फैसला किया। यानी छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में यदि वह चार राज्यों में छह फीसदी वोट या कम से कम दो प्रतिशत सीटें नहीं जुटा पाई तो उसकी मान्यता रद्द हो जाएगी।
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