आज अजय भवन किसी भूतिया बंगले सा दिखता है। 62 कमरों वाली इस इमारत में आज केवल चार नियमित कर्मचारी हैं। कैंटीन बंद पड़ी है क्योंकि कोई आता जाता ही नहीं है। एक-दो केंद्रीय पदाधिकारी ही नियमित रूप से बैठते हैं। पदाधिकारी अपने लिए तो खुद ही चाय-कॉफी बना लेते हैं।
अजय भवन के 42 कमरों में अटैच्ड टॉयलेट है। इनमें से 16 कमरों में 72 लोगों के रहने का इंतजाम है। 14 कमरों में चार बेड हैं और दो में आठ-आठ लोग रुक सकते हैं। तीसरी मंजिल पर बड़ा हॉल है। जबकि भूतल पर लाइब्रेरी, कैंटीन और बुकशॉप है। बिल्डिंग में दो लिफ्ट लगी है। केवल बिजली-पानी का महीने का बिल ही दो लाख रुपये का आता है।
नियमित कर्मचारियों की तनख्वाह और 40 पूर्णकालिक नेताओं को 13000 रुपये प्रतिमाह भत्ते का बोझ अलग से। एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि राजनीतिक वजूद सिमटने के साथ हमारी आय भी घटती जा रही है। अब हम अपना रोजमर्रा का खर्च उठाने में असमर्थ हैं। किसी तरह से पार्टी चल पा रही है।
1962 के लोकसभा चुनाव में भाकपा ने 10 फीसदी वोट प्राप्त करते हुए 29 सीटें जीती थीं। 956 में उसे 27 सीटें मिली थीं। 1967 और 1971 के चुनाव में भी उसे 23-23 सीटें मिली थीं। पिछले लोकसभा चुनाव में वह 21 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 67 सीटों पर लड़ी पर केवल एक सीट ही जीतने में सफल हुई। मत प्रतिशत भी 0.8 रह गया। राज्यसभा में भी उसका केवल एक ही सांसद है।
छिन सकता है राष्ट्रीय पार्टी का तमगा
कभी त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और केरल में शासन करने वाली पार्टी अब 19 विधायकों के साथ केरल की पिनराई विजयन सरकार में जूनियर पार्टनर है। 2014 चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने उसे राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता खत्म करने का नोटिस दिया था।
लेकिन 2016 में आयोग ने अपने नियमों को बदलते हुए पांच के बजाए दस साल के बाद मान्यता खत्म करने का फैसला किया। यानी छह महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में यदि वह चार राज्यों में छह फीसदी वोट या कम से कम दो प्रतिशत सीटें नहीं जुटा पाई तो उसकी मान्यता रद्द हो जाएगी।