सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने 2015 के फैसले को बरकरार रखा है जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के लिए सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत निजी और सार्वजनिक बैंकों से संबंधित विभिन्न वित्तीय जानकारी का खुलासा करने को अनिवार्य बना दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और दस बैंकों द्वारा वर्ष 2015 के फैसले को वापस लेने की गुहार वाली एक संयुक्त याचिका को खारिज कर दिया है।
जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस विनीत शरण की पीठ ने कहा कि आदेश वापस करने वाली याचिका विचारयोग्य नहीं है। पीठ ने कहा कि वास्तव में इस आवेदन के जरिए वर्ष 2015 के फैसले पर पुनर्विचार करने का प्रयास किया गया था।
2015 के फैसले को वापस लेने का आवेदन केंद्र सरकार, एसबीआई, पंजाब नेशनल बैंक, एचडीएफसी बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, यूको बैंक, इंडियन बैंक, कोटक महिंद्रा और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक ने दायर किये थे।
2015 में अपने ऐतिहासिक फैसले से शीर्ष अदालत ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया था कि आरबीआई ने एक ब?ी जिम्मेदारी के साथ बैंकों की वित्तीय जानकारी रखी है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि बैंकिंग नियामक(आरबीआई) को पारदर्शिता के साथ काम करना चाहिए और ऐसी जानकारी को नहीं छिपाना चाहिए जो बैंकों को शर्मिंदा कर सकती है।
इसके बाद वर्ष 2016 और 2019 में आरबीआई की ओर से डिस्क्लोजर नीतियां लाकर शीर्ष अदालत के फैसले के प्रभाव को कम करने की कोशिश की गई लेकिन शीर्ष अदालत द्वारा आरबीआई के खिलाफ अवमानना ??कार्यवाही शुरू करने के बाद नई नीति को हटा दिया गया था। इसके छह महीने के बाद बैंकों द्वारा आवेदन दाखिल पर 2015 के फैसले को वापस लेने की गुहार लगाई गई थी।