वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक के लोकसभा में पारित होने के बाद भी राज्य सभा में अटक जाने पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सवाल उठाया है कि सरकार की आर्थिक पहलों को रोकने के लिए राज्य सभा का किस हद तक इस्तेमाल किया जा सकता है।
बृहस्पतिवार को यहां चतुर्थ वार्षिक ग्रोथ नेट समिट को संबोधित करते हुए जेटली ने कहा कि सीधे जनता द्वारा निर्वाचित सदन, लोक सभा के महत्व को हमेशा बनाए रखना चाहिए। उनका इस तरह का बयान पहली बार नहीं आया है। इससे पहले, पिछले साल मई में भी जेटली ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती पैदा हो गई है जहां अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित ऊपरी सदन (राज्य सभा) सीधे जनता द्वारा चुने गए सदन (लोक सभा) के विवेक पर सवाल खड़ा कर रहा है। हालांकि उन्होंने कहा कि वह जीएसटी विधेयक पर कांग्रेस से बातचीत करेंगे।
उन्होंने सवाल पूछा कि आर्थिक निर्णय की प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए ऊपरी सदन का कहां तक इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया में यह बहस चल रही है, ब्रिटेन में कुछ समय पहले यह बहस हुई थी और इटली में भी इसी तरह की बहस चल रही है क्योंकि अंत में सीधे चुने गए सदन का महत्व तो हमेशा बरकरार रखना होगा।
वित्त मंत्री ने जीएसटी का कांग्रेस द्वारा किए जा रहे विरोध पर कहा कि आर्थिक सुधारों जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर सर्वसम्मत राय कायम की जानी चाहिए और इसको दलगत राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके लिए संविधान संशोधन विधेयक कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार लाई थी लेकिन अब कांग्रेस ने यू टर्न ले लिया है। प्रस्तावित विधेयक पर कांग्रेस के विरोध से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के लिए कठिन स्थिति उत्पन्न हो गई है।
उन्होंने आर्थिक सुधारों पर सकारात्मक चर्चा की आवश्यकता बताते हुए आश्चर्य व्यक्त किया कि संप्रग सरकार में वित्त मंत्री के रूप में जीएसटी विधेयक को तैयार करने वाले पी चिदंबरम विलासिता की वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने का कैसे सुझाव दे सकते हैं। इसलिए आर्थिक सुधारों के इस कदम पर परिपक्व परिचर्चा होनी चाहिए।