सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय (एनएफएआई) का मुख्य उद्देश्य होता है फिल्मी इतिहास को सहेजना। जिसमें भारतीय फिल्मों के साथ साथ विश्व सिनेमा भी शामिल होता है। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक यह सरकारी संस्था सिनेमा की अमर कृतियों को संरक्षित करने के प्रति उदासीन है। संग्रहालय से हजारों फिल्में ही नहीं बल्कि हमारा इतिहास भी लापता हुआ है। चलिए आपको उन फिल्मों के बारे में बताते हैं जो अब आप कभी नहीं देख पाएंगे-
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आलम आरा
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गायब हुई फिल्मों में आलम आरा का नाम भी शामिल है। यह फिल्म साल 1931 में आई थी। यह भारत की पहली टॉकीज फिल्म है। इस फिल्म के निर्देशक अर्देशिर ईरानी थे। जिन्होंने सिनेमा में ध्वनि के महत्व को समझते हुए आलम आरा को और कई समकालीन सवाक फिल्मों से पहले पूरा किया। यह उर्दू भाषा में बनाई गई थी।
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मिल (मजदूर)
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यह फिल्म साल 1934 में आई थी। यह पहली ऐसी भारतीय टॉकीज फिल्म थी जिसे ब्रिटिश सेंसर ने बैन किया था। यह फिल्म प्रेमचंद ने मिल हड़ताल पर लिखी थी। यह भी संग्रहालय से गायब है।
राजा हरिश्चंद्र
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साल 1913 में दादा साहेब फालके की क्लासिक फिल्म राजा हरिश्चंद्रर आई थी। फिल्म के प्रिंट एक अग्नि दुर्घटना में जल गए।
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जिंदगी
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इन समाप्त हुई फिल्मों में जिंदगी नाम की फिल्म भी शामिल है। यह फिल्म साल 1940 में आई थी। इस फिल्म के गीत आज भी लोगों के बीच प्रसिद्ध हैं। फिल्म का एक गीत - सो जा राजकुमारी.. सो जा.. को आज भी लोगों द्वारा खूब पसंद किया जाता है।
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संत तुकाराम
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यह फिल्म साल 1936 में आई थी। फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पुणे में एक अग्निदुर्घटना में यह भी बर्बाद हो गई।
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चंडीदास
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ये फिल्म साल 1934 में आई थी। फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पुणे में हुई अग्निदुर्घटना में इसे मिलाकर कुल 45 फिल्में समाप्त हो गई हैं।
केवल 5-6 बची हैं मूक फिल्में
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संग्रहालय में कुल 1700 भारीय मूक फिल्में थीं जिनमें से अब केवल 5-6 ही बची हैं।
दुर्घटना का शिकार बनी ये फिल्में भी
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पुणे में साल 2003 में नेशनल फिल्म आर्चीव्स ऑफ इंडिया में हुई दुर्घटना का शिकार कालिया मर्दन (1935), भक्त प्रहलाद (1967) और आगे बढ़ो (1947) जैसी फिल्में भी हुईं। इस दुर्घटना में करीब 600 फिल्मों के प्रिंट जलकर समाप्त हो गए।
60 फिल्में बॉम्बे टॉकीज में आग के हवाले
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साल 2014 में बॉम्बे टॉकीज में आग लगने से करीब 60 फिल्में खत्म हो गईं। इन फिल्मों में नैया (1936) और ज्वार भाटा (1944) भी शामिल थीं।
इसलिए भी नहीं रह सकीं सुरक्षित
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साल 1951 से पहले बनी फिल्मों के टेप एक खास तरीके के केमिकल से तैयार किए जाते थे। जो ज्यादा लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकते। यह भी इनके समाप्त होने का एक कारण है। इन फिल्मों के प्रति इनका रख रखाव करने संस्थाओं ने भी उदासीनता दिखाई है। इन्हें डिजिटल प्रिंट में भी नहीं बदला गया। बता दें डिजिटल प्रिंट में अनेकों कॉपियां तैयार की जाती हैं। लेकिन पुराने तरीके से एक ही कॉपी बनती है। रिपोर्ट के अनुसार संग्रहालय से करीब 9,200 फिल्में गायब हुई हैं। जिसमें सत्यजीत रे से लेकर अकीरा कुरोसावा जैसे फिल्मकारों की फिल्में भी शामिल हैं।
एनएफएआई के रिकॉर्ड्स में एंट्री होने के बावजूद भी फिल्म रील के 51,500 कैन और 9,200 से ज्यादा प्रिंट्स संग्रहालय में मौजूद नहीं हैं। वहीं 1,112 फिल्में तो ऐसी भी हैं जिनकी रिकॉर्ड्स में एंट्री तक नहीं है।