प्रख्यात फिल्मकार और गीतकार गुलजार ने अमर उजाला शब्द सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि सीधा बोलना, साफ बोलना-कहना ज्ञानरंजन की विशेषता है। कार्यक्रम में दिए गए ज्ञानरंजन के वक्तव्य की याद दिलाते हुए गुलजार ने कहा कि किसी को बुरा लगे तो लगे, लेकिन सच नहीं बदला जा सकता... उसे कैसे नरम किया जाए। सच को खस्ता तो नहीं बनाया जा सकता। ज्ञानरंजन जी की यही बड़ी खूबी है, जो हम उनसे सीखते हैं और उनको सलाम करते हैं।
अपने खास लहजे में उन्होंने ज्ञानरंजन से शिकायत भी की कि उन्होंने कहानी लिखना क्यों छोड़ दिया... तब जबकि वक्त की कहानी तो चल रही है, हिंदुस्तान की कहानी चल रही है अभी और पक रही है। मुंबई आकर आयोजन करने पर गुलजार ने अमर उजाला को बधाई दी। अमर उजाला की इस विशेष पहल के लिए भालचंद्र नेमाडे ने भी पत्रसमूह का विशेष आभार किया।
आधुनिक भाषा असफल हुई: ज्ञानरंजन
अपने रचनाकर्म और संपादककर्म को रेखांकित करते हुए ज्ञानरंजन ने कहा कि संपादकीय दुनिया गहरी जिद के साथ की तो अपने लेखन को ईंधन की तरह उसमें झोंक दिया। इसके बिना पहल (पत्रिका) की दुनिया बनाई नहीं जा सकती थी, जिसमें आज देश-देशांतर के अनमोल रचनाकार यात्रा कर रहे हैं। आज के समय पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि हम दलदल में गगनचुंबी इमारतें बना रहे हैं।
ज्ञानरंजन ने कहा, पहले आततायी बर्बर बाहर से आते थे, अब वे घर से निकल रहे हैं। घर-बाहर का अंतर समाप्त है। इसको रचने के लिए आधुनिक भाषा असफल हो गई है, क्लासकीय और जनपदीय वाक्य कारगर गद्य नहीं बना पा रहे। कुछ भी बताना आसान नहीं है। इस जगमगाती शाम के बाद मुझे इसी देश-दुनिया में वापस लौटना है, जहां रात बहुत लंबी है और मुझे काम स्थगित नहीं करना है।