देश के अनेक हिस्सों में हुई तेज बारिश लोगों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। इस बारिश से किसानों की खेती भी बर्बाद हो रही है। बारिश के चलते इस समय बोई जाने वाली सब्जियों-फलों की खेती के भी नष्ट होने का खतरा मंडरा रहा है, क्योंकि किसी भी खेत में दो घंटे से ज्यादा देर तक पानी ठहरने से सब्जियों और फलों की कोमल पौध गल जाती है, जिससे किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ता है।
कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि अगर किसान थोड़ी सावधानी बरतते हुए आधुनिक तरीके से खेती करें, तो वे बारिश से होने वाले इस नुकसान से बच सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि किसानों को बीज बोने की बजाय, उन्हीं फसलों की नर्सरी में तैयार पौध लगाना ज्यादा कारगर होता है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक सब्जी-फलों की खेती ऐसी जगहों पर नहीं की जानी चाहिए, जहां लंबे समय तक पानी ठहरने की आशंका हो। इसके लिए कुछ ऊंचे स्थान का चयन करना चाहिए। खेतों में भी ऊंची मेड़ बनाकर उन पर पौध लगाना चाहिए, जिससे अधिक पानी के होने वाले नुकसान से उन्हें बचाया जा सके। पानी की निकासी की व्यवस्था अवश्य होनी चाहिए अन्यथा जमा हुआ पानी फसलों को नष्ट कर सकता है।
बारिश के समय केवल पानी ही फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाता है, बल्कि फफूंद और विषाणु भी उसे नष्ट कर सकते हैं। इसलिए फसलों को इन नुकसानों से बचाने के लिए भी किसान को सतर्क रहना चाहिए। पौधों को फफूंद से बचाने के लिए ब्लाइटोक्स, रिडोमिल या कार्बेन्डाजीन को दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर उन्हें छिड़काव करना चाहिए।
इस समय सफेद मक्खी फसलों में वायरस फैलाती है। इससे प्रभावित होने पर पौधे सिकुड़ जाते हैं और फल-फूल का उत्पादन नहीं देते हैं। इससे बचने के लिए रोगर दवा का छिड़काव दो मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए। सफेद मक्खी को खेतों में आने से रोकने के लिए एक किलो नीम की खली को पांच लीटर पानी में रात भर भिगोकर सुबह पौधों पर छिड़काव करना चाहिए। इसकी गंध से सफेद मक्खी फसलों से दूर रहती है। हालांकि इसके लिए नेट हाउस या पोली हाउस भी लगाया जा सकता है। नेट हाउस लगाने से सफेद मक्खी खेतों में नहीं पहुंचती है। नेट हाउस लगाने में आये खर्च पर सरकार 50 फीसदी की छूट भी देती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसके सिंह ने अमर उजाला को बताया कि पारंपरिक रूप से हमारे किसान भाई खेतों में सूखे बीज बोकर उनसे सब्जी-फल पैदा करते हैं, लेकिन यह विधि कम उपयोगी है। अगर इन्हीं फसलों की छोटी उन्नत पौध नर्सरी से लाकर लगायी जाए, तो अच्छी फसल पैदा होती हैं। वहीं अगर नर्सरी का विकल्प न हो तो किसान खुद ही नर्सरी के प्रारूप पर बीज से पौध तैयार कर सकते हैं। इसके लिए सीड ट्रे में पौधे उगायें। सीड ट्रे को खुद ही पीट और वर्मिको लाईट के 3:1 के अनुपात में मिश्रण से बनाया जा सकता है। इसके बाद इनमें बीज डालकर पौध उगायें और उन्हें खेतों में रोपें।
पारंपरिक तौर पर हमारे किसान एक साथ खेतों में बीज रोपते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि खेत को कई हिस्सों में बांट लें और एक-एक हफ्ते के अंतराल पर एक-एक हिस्से में पौध लगायें। इससे फसल तैयार होने पर हर हफ्ते आपके पास बेचने के लिए नई फसल होगी। इससे ज्यादा लंबे समय तक लाभ लिया जा सकता है। जबकि एक साथ पौध तैयार होने पर उसे सीमित समय में बेचने की मजबूरी होती है, जिससे फसल का दाम गिर जाता है और किसानों को ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता।
किसान भाई अगर उन्नत किस्म के बीज खरीद कर लाते हैं, तो उस बीज के खरीद की रसीद और उसका डिब्बा संभालकर रखें। कंपनी हर पैकेट पर इस बात की जानकारी देती है कि उस बीज को रोपने से न्यूनतम कितने फीसदी बीज अंकुरित होंगे। अगर अंकुरण कम होता है, तो किसान को न सिर्फ बीज के पूरे दाम वापस मिलते हैं, बल्कि किसान को फसल के नुकसान की भरपाई भी की जाती है। यह सरकारी प्रावधान सीड एक्ट में शामिल है और कोई भी बीज कंपनी इसे मानने से इनकार नहीं कर सकती है।