हमारे देश में किसानों को अन्नदाता कहा जाता है। ये उनकी ही कड़ी मेहनत की वजह से संभव हो पाता है कि हम चैन से दो वक्त का खाना खा पाते हैं। लेकिन यह बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि समय-समय पर उन्ही किसानों को अपनी मांगें मनवाने के लिए तमाम सरकारों के चौखट पर अपना माथा टेकना पड़ता है, फिर भी उनकी मांगों का सरकारों पर कोई खास असर नहीं पड़ता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब किसानों से किए वादे सरकारों ने पूरे नहीं किए हैं, उन्होंने अपना रौद्र रूप धारण किया है। पिछले दो सालों की अगर बात करें तो किसानों ने अपनी मांगें मनवाने के लिए कई बार विरोध प्रदर्शन किया है, जो बाद में उग्र हो गया।
महाराष्ट्र में फिर बड़ा किसान आंदोलन
महाराष्ट्र में किसान आंदोलन अब आम सी हो गई है। यहां समय-समय पर किसानों के आंदोलन होते रहते हैं। एक बार फिर लोक संघर्ष मोर्चा के बैनर तले महाराष्ट्र के आदिवासी और किसान मुंबई के आजाद मैदान पहुंच चुके हैं। इस आंदोलन में 20 हजार से ज्यादा किसान शामिल हुए हैं।
क्या है किसानों की मांगें
किसानों की मांग है कि उनका कर्ज माफ किया जाए, उन्हें सूखे का मुआवजा मिले और जंगलों की जमीन को आदिवासियों को हस्तांतरित की जाए। इसके अलावा भी उनकी राज्य सरकार से कई दूसरी मांगे हैं। मुख्य रूप से लोड शेडिंग की समस्या, वनाधिकार कानून लागू करने, सूखे से राहत, न्यूनतम समर्थन मूल्य, स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने जैसी मांगों के साथ ये किसान सड़कों पर उतरे हैं।
किसानों ने इससे पहले भी अपनी मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। किसानों का कहना है कि पिछले प्रदर्शन को करीब 9 महीने हो गए हैं, जिनमें से किसानों को दिए गए कई आश्वासन अब तक पूरे नहीं हो सके हैं। संगठन का कहना है कि अगर महाराष्ट्र सरकार की ओर से कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया जाता है तो आंदोलन की समय सीमा को और आगे बढ़ाया जा सकता है। बता दें कि महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा हर साल सूखे की चपेट में आता है, साथ ही किसानों की आत्महत्या भी सरकार के लिए गंभीर चुनौती का विषय है।
किसान क्रांति यात्रा (दिल्ली)
पिछले महीने दिल्ली से सटे नोएडा में भी भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले करीब 30 हजार किसानों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इस दौरान किसानों ने लाठियां भी खाईं, लेकिन अपनी मांगों पर अड़े रहे। हालांकि बाद में सरकार ने उनकी कुछ मांगें मान ली, जिसके बाद आंदोलन खत्म हुआ।
यहां भी किसानों की कई मांगें थीं, जिसमें कर्ज माफी, न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक दर्जा देना और स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाए गए फार्मूले शामिल थे।
सबसे भयानक था मंदसौर किसान आंदोलन
मध्य प्रदेश के मंदसौर में पिछले साल हुए किसान आंदोलन की भयावह यादें आज भी लोगों के जेहन में हैं। किसानों का आंदोलन 1 जून, 2017 को शुरू हुआ था, जो कई दिनों तक चला था। इस दौरान पुलिस से हुई झड़प में कई किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
क्या थी मध्य प्रदेश के किसानों की मांगें
मध्य प्रदेश के किसानों ने कृषि उपज के उचित मूल्य की मांगों के साथ 19 सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलन किया था। किसानों की प्रमुख मांगें थीं कि उनकी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य दिया जाए। खेती के लिए बिना ब्याज के कर्ज मिले। 60 साल किसानों के लिए पेंशन स्कीम लागू की जाए। एक लीटर दूध के लिए दुग्ध उत्पादकों को 50 रुपये कीमत मिलेष प्याज और आलू की खरीदारी भी राज्य सरकार उचित मूल्य पर करे।
गन्ना किसान आंदोलन
अभी हाल ही में पंजाब के होशियारपुर में गन्ना किसानों ने प्रशासन के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया था। इस दौरान 20 से ज्यादा ट्रेनों को रद्द कर दिया गया था, जबकि किसानों के धरने के कारण कई ट्रेनों के रूट बदल दिए गए थे। इसके अलावा किसानों के आंदोलन के कारण सड़कें भी जाम हो गई थीं।
हालांकि बाद में प्रशासन ने किसानों की मांगें मान ली थी। गन्ना संघर्ष कमेटी अध्यक्ष सुखपाल सिंह दाफ्फर ने बताया था कि समझौते के तहत 200 करोड़ रुपये जो कि पिछले साल की बकाया राशि थी, एक हफ्ते में किसानों के खाते में डालने, बाकी रकम मिल चलने से पहले दिए जाएंगे।
राजस्थान में भी नाराज किसानों की रैलियां
राजस्थान में भी प्रशासन और सरकार से नाराज किसान 2017 से लेकर 2018 तक लगातार सड़कों पर उतरते रहे। एक सितंबर से 13 सितंबर 2017 तक आंदोलन के बाद फरवरी 2018 में भी किसानों ने सीकर से जयपुर तक बड़ा प्रदर्शन किया था। इस दौरान किसानों ने बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां भी दीं थी।
तमिलनाडु में भी किसानों ने किया था बड़ा प्रदर्शन
अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के हजारों किसान जंतर-मंतर पर अजीबो-गरीब वेश-भूषा के साथ प्रदर्शन किया था। किसान खोपड़ी लेकर पहुंचे थे। किसानों ने 41 दिनों तक यहां प्रदर्शन किया था, तब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री खुद किसानों से बात करने दिल्ली पहुंचे थे।
किसानों ने नर खोपड़ियों के साथ प्रदर्शन किया था और उन्होंने दावा किया था कि ये खोपड़ियां आत्महत्या करने वाले किसानों की हैं। फिर इन किसानों ने एक दिन अर्द्ध-नग्न होकर भी प्रदर्शन किया था। भारी गर्मी में किसानों ने सड़क पर लेट कर अपना विरोध दर्ज कराया था। इसके अलावा किसानों ने सिर के आधे बाल और आधी मूंछ कटाकर भी प्रदर्शन किया था।