कृषि कानूनों पर स्थिति बिगड़ते देख अंततः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं मोर्चा संभाल लिया है। उन्होंने शुक्रवार को मध्यप्रदेश के किसानों से बात कर उनका भरोसा जीतने की कोशिश की और उन्हें बताया कि कृषि कानून उनके हित में हैं। इसके बाद भी अगर किसी को कानूनों को लेकर कोई शंका है तो वे सबसे वार्ता करने को तैयार हैं। इस मोर्चे पर प्रधानमंत्री अब तक 'मन की बात' कार्यक्रम या अन्य मंचों से ही बोलते रहे हैं। यह पहली बार है जब वे स्वयं सीधे किसानों से बातचीत करने को सामने आए और उनकी शंकाओं का समाधान करने की कोशिश की। सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मैदान में उतरने से किसानों का गुस्सा थम जाएगा? किसान नेताओं के मुताबिक मोदी केंद्र सरकार के ट्रंप कार्ड जरूर हैं, लेकिन इस बार मामला इतना आसान नहीं है।
एक किसान नेता ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से हर व्यक्ति परिचित है। जनता के बीच उनका एक बड़ा प्रशंसक वर्ग है। हम भी जानते थे कि भाजपा देर-सबेर उन्हें इस मोर्चे पर अवश्य उतारेगी। लेकिन इस मामले में बात इतनी आसान नहीं रह गई है। अब अगर प्रधानमंत्री स्वयं भी सामने आ जाते हैं तो भी उन्हें किसानों की शंकाओं का समाधान करना पड़ेगा। किसान इस बार खाली हाथ वापस जाने को तैयार नहीं हैं।
हालांकि, अब तक किसानों का रूख रहा है कि वे तीनों कानूनों के वापस लेने से कम पर राजी नहीं होंगे। लेकिन अब कुछ किसान संगठन अपनी मांगों में कुछ कमी करने का संकेत दे रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने भी यूपी बॉर्डर पर गुरुवार की खाप पंचायत के दौरान कहा कि मामले का समाधान तभी निकल सकता है जब किसान और सरकार दोनों ही अपने रूख में नरमी लाएं।
इसके पहले एआईकेएससीसी के एक बड़े नेता ने भी इसी तरह की बात कही थी जिसके कारण उन्हेंं संगठन से बाहर जाना पड़ा था। इसके पहले भारतीय किसान संगठन के पंजाब स्थित एक अन्य गुट ने भी सरकार से बातचीत को सहमत होने की बात कही थी। जब से सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का हल निकालने के लिए एक कमेटी गठित कर बातचीत आगे बढ़ाने की बात कही है, तब से किसान संगठनों के बीच भी वार्ता में ढील देने पर सहमति बढ़ रही है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए माना जा रहा है कि अब वार्ता की कुछ गुंजाइश बन सकती है। लेकिन इसके बाद भी न्यूनतम समर्थन मूल्य को वैधानिक बनाने की मांग पर बातचीत अटक सकती है क्योंकि सरकार यह 'परेशानी’ अपने सिर नहीं बांधना चाहती है।
किसान तेज कर रहे आंदोलन
ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति के सचिव अविक साहा ने अमर उजाला से कहा कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या सुपीम कोर्ट की पहल से इस मामले का कोई हल निकलता है तो यह अच्छी बात होगी। लेकिन सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि किसान इस बार खाली हाथ लौटने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि बातचीत की इस कोशिश के बीच भी वे आंदोलन को और तेज करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
16 दिसंबर को कोलकाता में किसानों की एक बड़ी रैली का आयोजन किया गया था। 26 दिसंबर को महाराष्ट्र में भी एक बड़ा किसान आंदोलन करने की तैयारी है। अगर केंद्र सरकार समस्या का जल्द हल नहीं निकालती है तो इसका स्वरूप जल्दी ही और विकराल हो सकती है। उन्होंने कहा कि अब हमारी कोशिश आंदोलन को भाजपा शासित राज्यों में तेज करने की है।