नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का आंदोलन दो महीने से जारी है। इस दौरान अब तक कई किसानों की मौत हो चुकी है। कुछ किसानों की ठंड के कारण मौत हुई तो कुछ ने खुदकुशी कर ली। सिंघु बॉर्डर पर बढ़ते आत्महत्या के मामले से किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। आंदोलन के लंबा चलने और केंद्र सरकार द्वारा मांगें नहीं माने जाने के कारण अब किसानों की मनोस्थिति पर भी प्रभाव पड़ने लगा है। ऐसे में रोज करीब दस से बारह किसान बॉर्डर पर मनोचिकित्सकों का सहारा ले रहे हैं। हफ्ते में चार दिन मनोचिकित्सक किसानों का इलाज कर रहे हैं। गंभीर रुप से बीमार किसानों को घर भी भेजा जा रहा है।
सिंघु बॉर्डर पर बढ़ते आत्महत्या के मामलों को देखते हुए यूनाइटेड सिख संगठन ने किसानों के लिए कैंप लगाया है। कैंप में साइकेट्रिस्ट सप्ताह में चार दिन किसानों से मिलते हैं। डॉक्टर हरजीवन सिंह ने अमर उजाला को बताया कि आत्महत्या के बढ़ते मामले और लंबे चलते आंदोलन से किसानों की मनोस्थिति पर दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। किसान परेशान न हों और वे अपनी परेशानी डॉक्टरों से साझा कर सकें इसलिए हमने यहा कैंप लगाया है।
यूनाइटेड सिख संगठन से जुड़े राजेंद्र सिंह ने अमर उजाला को बताया कि, जैसे ही किसान हमारे पास आते हैं तो डॉक्टरों की टीम उनकी मनोस्थिति और उनके स्ट्रेस लेवल को लेकर चर्चा करती है। 35 से 45 आयु वर्ग के किसानों में घर से दूर रहने और कमाने-खाने को लेकर स्ट्रेस लेवल बढता हुआ दिखाई दे रहा है। वहीं अधिकांश किसानों के मन मे डर है कि हम दो माह से आंदोलन कर रहे हैं हमारी बातें सरकार सुनेगी भी या नहीं। आंदोलन का मकसद पूरा नहीं होने के कारण उनमें हीन भावना तक देखने को मिल रही है।
उन्होंने आगे बताया कि अधिकांश किसानों ने प्रतिज्ञा ले रखी है कि हम कानून वापस करवा कर ही घर जाएंगे। ऐसे में उनके मन पर विपरीत प्रभाव भी देखने को मिल रहे हैं कि सरकार तो मान नहीं रही है अब हम कब तक घर से दूर रहेंगे। किसानों की समस्याओं को देखते हुए डॉक्टर उन्हें योग के साथ-साथ कुछ दिन के लिए घर जाने की सलाह भी दे रहे हैं। कम स्ट्रेस लेवल वाले किसानों की काउंसलिंग की जाती है। वहीं जिन किसानों की मनोस्थिति ज्यादा खराब हो रही है उन्हें सीधे जाने की सलाह दी जाती है, ताकि वे कोई गलत कदम न उठा लें।