नए कृषि सुधार कानूनों पर ‘अटल’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मास्टर स्ट्रोक के बाद आंदोलनकारी किसानों के बीच ‘वार्ता’और ‘ना’ के बीच उलझन बढ़ गई है। यही कारण है कि सरकार के नए पत्र का जवाब जल्दबाजी में देने से परहेज किया गया। शनिवार को फिर संयुक्त किसान मोर्चा इस पर मंथन करने वाला है। इसके बाद ही सरकार को संदेश भेजा जाएगा। नए सिरे से वार्ता की गुंजाइश ‘हां’और ‘ना’ के बीच संशय है।
मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक’
क्रिसमस और अटल जयंती पर मोदी ने 9 करोड़ किसानों के खाते में 18 हजार करोड़ की सम्मान निधि जारी कर एक तीर से कई शिकार किए। आंदोलनकारी अब तक सियासी दखल और किसी की ‘कठपुतली’ के आरोपों को खारिज करते रहें, वहीं मोदी ने इसे विपक्ष की ‘जड़ी-बूटी’ का अवसर करार दिया। मोदी ने इशारा किया कि कुछ लोग बातचीत में अड़ंगा डाल रहे हैं। आंदोलनकारी किसान पहले से इसे विस्तार देने के लिए पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत तक पैठ की प्राथमिकता तय कर चुके हैं। तृणमूल कांग्रेस के पांच सांसदों के सिंघु बॉर्डर पहुंचकर समर्थन देने को इसी की कड़ी माना जा रहा है। अब खुद मोदी ने ही पश्चिम बंगाल के 70 लाख किसानों के सम्मान निधि से वंचित होने पर ममता बनर्जी के साथ-साथ वामपंथियों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
बंगाल चुनाव के लिए ‘बाउंसर’
आंदोलनकारी किसान पश्चिम बंगाल के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में मोदी व भाजपा को घेरने की रणनीति बना रहे थे। अब खुद मोदी ने ही इसकी चुनौती दे डाली। वामपंथियों व कांग्रेस को एपीएमसी पर केरल और पश्चिम बंगाल में किसानों की अनदेखी पर दोनों राज्यों में आंदोलन के लिए ललकारा। पीएम मोदी की दो रणनीति रही। ‘भगवा’ बनाम ‘लाल’ के बीच हरित क्रांति के किसानों का साथ जुटाना। किसान आंदोलन के लंबा खिंचने की सूरत में पश्चिम बंगाल में अभी से अपने पक्ष में माहौल तैयार करना। ममता का आरोप है कि किसानों के लिए मोदी ने मदद नहीं की। बंगाल चुनाव में आंदोलनकारी किसानों व ममता से घिरे मोदी ने चक्रव्यूह को भेदा।
चुनाव में मोदी ममता को पलट जवाब दे सकते कि किसानों की सूची उपलब्ध नहीं कराई गई और राज्य सरकार को पैसा जारी कर वह ‘कटमनी’ का जोखिम नहीं उठाना चाहते। इसलिए उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को याद कर कहा, अब रुपया घिसता नहीं, किसी की जेब में नहीं जाता। हां यह बता देना जरूरी है कि नये कृषि सुधारों के बाद बिहार में पहला चुनाव हुआ। तब सियासी पंडित मान रहे थे कि कृषि कानूनों का वहां के चुनाव नतीजे पर असर पड़ सकता है लेकिन बिहार चुनाव में यह मुद्दा तक नहीं बना। जानकार मानते हैं कि बिहार में मंडी सिस्टम पहले से खत्म है इसलिए पूरे चुनाव में चर्चा तक नहीं हुई, चुनाव नतीजे प्रभावित करना तो दूर की कौड़ी।
वार्ता की नई पेशकश ‘गुगली’
देश के किसानों का समर्थन जुटाने के इस अभियान की पूर्व संध्या पर मोदी सरकार की ओर से आंदोलनकारी किसानों से वार्ता की नई पेशकश की गई। किसान संगठनों को भले यह लगा कि इसमें नया कुछ भी नहीं और सिरे से खारिज कर देना चाहिए लेकिन सरकार ने देश के बाकी किसानों के साथ-साथ आमजनता के बीच बातचीत से हल का संदेश दे डाला। शुक्रवार को जब मोदी विपक्ष पर हमलावर थे, तभी सरकार के चाणक्य अमित शाह यह भरोसा दिला रहे थे कि मोदी सरकार में कोई कॉरपोरेट किसी किसान की जमीन हथिया नहीं सकता। राजनाथ सिंह ने खुद को किसान का बेटा बताते हुए कहा कि इस सरकार में किसानों का अहित नहीं होगा। राजनाथ ने तो कृषि सुधार कानूनों को प्रयोग के तौर पर एक-दो साल चलने देने की वकालत की और कहा यदि गड़बड़ी हुई तो भविष्य में इसे बदल देंगे।
देशप्रेम की ‘बाउंड्री’
मोदी ने सवाल उठाया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करने वाले आंदोलनकारी अचानक किसानी मुद्दों से भटक कर दंगा के आरोपियों और विचारकों की रिहाई की मांग कैसे करने लगे। मानवाधिकार दिवस पर ऐसे आरोपियों के पोस्टर लहराने का भी मुद्दा उठाकर देशप्रेम की बाउंड्री भी लगाई।
केक से कड़वाहट दूर करने की पहल
क्रिसमस और अटल जयंती पर खुद मोदी ने भी किसानों के साथ कड़वाहट दूर करने की कोशिश की। कहा कि तर्कसंगत बातचीत हो। जाहिर है कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल के पत्र में भी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर उठाए गए सवाल को तर्कसंगत नहीं बताया गया है। मोदी ने किसानों से संवाद के दौरान यह दो टूक संदेश भी दे दिया कि न कानून वापस होगा और न एमएसपी की कानूनी गारंटी। हां, न्यूनतम समर्थन की लिखित गारंटी को सरकार तैयार है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने फिर से उम्मीद जताई है कि वार्ता के लिए जल्द नई तारीख आएगी और हल निकलेगा।
‘वार्ता’और ‘ना’ के बीच विभाजन की लकीर
उधर, सरकार के नए पत्र पर दो दिनों के विमर्श के बाद पंजाब के किसान संगठन सरकार को ‘ना’ कहने पर कायम हैं लेकिन संयुक्त मोर्चा इस पर जल्दीबाजी में फैसला लेने के बजाये और संगठनों को भी विश्वास में ले रहा है। इसकी वजह इस पत्र का मजमून है। सरकार ने साफ किया है कि वह सभी किसान संगठनों से वार्ता कर रही है। ऐसे में एकजुटता का संकट बरकरार है। कई किसान नेता मोदी के भाषण को महज बांटने वाला बताते हैं। ऐसे किसान नेताओं का सवाल है कि जब पीएम मोदी एमएसपी खत्म नहीं होने की बात कर रहे हैं तो गारंटी देने से हिचक क्यों। यहां एमएसपी पर लिखित और कानूनी गारंटी के बीच पेच फंसा है। दूसरी तरफ, कुछ संगठन बार-बार की अपील पर सरकार को वार्ता का एक मौका देने के पक्ष में हैं। ऐसे में यदि ‘डेडलॉक’ से ‘डॉयलॉग’की स्थिति बहाल नहीं हो पाती, तो सरकार यही संदेश देगी कि हमारी कोशिश वार्ता से हल की रही, आंदोलनकारी नहीं मानें। सरकार यही बात जनता की अदालत से लेकर सर्वोच्च अदालत तक रख सकती है। यही कारण है कि नये सिरे से वार्ता की गुंजाइश भी बची है।
‘घेराव’ को समर्थन में बदलने की ‘गांधीगीरी’
सरकार के तेवर के बाद संयुक्त किसान मोर्चा को भाजपा के जनप्रतिनिधियों (मंत्रियों,सांसदों, विधायकों) के ‘घेराव’ को अब समर्थन जुटाने के लिए पत्र सौंपने की मुहिम में बदलना पड़ा है। हालांकि, पंजाब में भाजपा नेताओं के घेराव का आंदोलन पिछले तीन महीने से जारी है। देश के बाकी हिस्सों में अब भाजपा नेताओं के ‘घेराव’ के बजाये उन्हें पत्र सौंपकर समर्थन मांगने की ‘गांधीगीरी’ पर उतरना पड़ा। इसकी दो वजहें हैं। पहला यह कि आंदोलनकारी किसान टकराव नहीं चाहते। अटल जयंती पर बठिंडा में आयोजित कार्यक्रम के दौरान भाजपा समर्थकों और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी। इससे पहले अंबाला में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल और यूपी में मुरादाबाद के एसएसपी से आंदोलनकारी उलझ चुके हैं। दूसरी वजह यह है कि सरकार बार-बार वार्ता का संदेश देकर आंदोलनकारियों को कठघरे में खड़ा कर रही है। संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य और पंजाब क्रांतिकारी किसान यूनियन के डॉ. दर्शनपाल ने संदेश के जरिये 26 दिसंबर से विदेशों में भारतीय दूतावासों पर प्रदर्शन कर समर्थन मांगा है। इधर, शुक्रवार को हरियाणा के कुछ टोल भी फ्री कराए गए। दिल्ली-जयपुर हाई-वे के टोल भी फ्री हुए। टोल फ्री आंदोलन रविवार तक चलेगा। इस बीच पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड से किसानों को दिल्ली की सीमाओं पर जुटाने का सिलसिला जारी है।