हरियाणा की राजनीति लंबे समय तक किसानों के इर्द गिर्द घूमती रही है। भाजपा को छोड़ दें तो बाकी दलों की जड़े कहीं न कहीं ग्रामीण परिवेश, खासतौर पर किसानों के साथ जुड़ी रही हैं। यह तय है कि किसान आंदोलन, प्रदेश की राजनीति की दशा और दिशा तय करेगा। हो सकता है कि किसान आंदोलन में मुखौटा लगाकर घूमने वाले राजनेताओं को आगामी चुनाव में तगड़ा झटका लग जाए। इसका असर उन राजनीतिक दलों पर भी पड़ेगा, जो सीधे तौर पर इस आंदोलन की खिलाफत करते नजर आ रहे हैं।
प्रदेश की राजनीति की गहरी समझ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार बताते हैं, किसान आंदोलन में मुखौटा पहनकर जाने वाले राजनीतिक दलों को आने वाले समय में नुकसान उठाना पड़ सकता है। चूंकि जजपा का जनाधार किसान आधारित रहा है, इसलिए आंदोलन का सबसे ज्यादा असर इसी पार्टी पर पड़ेगा। पार्टी की कमान संभाल रहे डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने आंदोलन के बीच केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों के साथ बैठक कर यह जताने का प्रयास किया है कि वे किसानों की मांगों को लेकर संजीदा हैं।
किसान आंदोलन से भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा, पार्टी नेता ऐसा मानकर चल रहे हैं। इसका कारण यह है कि किसान, पार्टी का परंपरागत वोट बैंक नहीं रहा है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को किसानों के बहुत कम वोट मिले थे। लोकसभा चुनाव में किसानों ने मोदी सरकार को जबरदस्त समर्थन दिया था। अब केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच समझौता हो जाता है तो उसका थोड़ा बहुत फायदा प्रदेश भाजपा को मिल सकता है।
यदि दिल्ली में टकराव की स्थिति बनती है तो खट्टर सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर जजपा पर देखने को मिलेगा। चुनाव में कांग्रेस पार्टी जजपा पर यह कहकर हमला बोलेगी कि किसान आंदोलन में यह पार्टी सत्ता से चिपकी रही। इसके नेता त्यागपत्र देकर आंदोलन में शामिल क्यों नहीं हुए। हुड्डा और सुरजेवाला तो लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि जजपा को किसानों से कोई लेना-देना नहीं है। जजपा ने किसानों के साथ विश्वासघात किया है। अब देखने वाली बात यह होगी चुनाव में जजपा खुद को इन आरोपों से कैसे बाहर निकालेगी।