पानीपत को पार करके अमृतसर तक चले जाइए या पटियाला की तरफ रुख कीजिए, हाईवे पर किसान आंदोलन के झंडे बिकते हुए मिलेंगे। जहां एक तरफ की सड़कों पर सिंघु-टीकरी बार्डर से लौटते किसानों के ट्रैक्टर और गाड़ियां मिलेंगी तो दूसरी तरफ से सामानांतर विपरीत दिशा में दिल्ली की तरफ आती गाड़ियां। रास्ते में करनाल, पानीपत, अंबाला, लुधियाना, जालंधर, अमृतसर हर जगह किसान आंदोलन की चर्चा करते और पक्ष में खड़े लोग मिलेंगे। पंजाब में कुछ इसी तरह से किसान आंदोलन की लहर चल रही है।
पानीपत के राजेश कौशिक का कहना है कि सोनीपत, पानीपत, करनाल, अंबाला के गांवों में जगह-जगह किसानों की पंचायतें, सभाएं चल रही हैं। किसान लोगों को जागरूक कर रहे हैं। गांव-गांव में अभी किसान अपने आंदोलन के समर्थन में कैंपेन चला रहे हैं। यह जन समर्थन का प्रयास मार्च तक चलेगा। किसान नेता गुरुनाम सिंह चढ़ूनी, हरमीत सिंह कादियान, बलवीर सिंह राजेवाल समेत तमाम नेताओं ने जमीनी तैयारी तेज कर दी है।
चौधरी हरपाल सिंह का कहना है कि सब कुछ रणनीति के तहत हो रहा है। किसानों का खर्च किसानी से ही चलता है। इसलिए सभी किसान संगठनों ने मिलकर योजना बनाई है। संयुक्त किसान मोर्चा ने यह रणनीति तैयार की है कि किसान गेहूं की तैयार होती फसल को आखिरी पानी देने (सिंचाई) तथा उनका रख-रखाव करने के लिए खेतों की तरफ जाएं। गांवों और पंचायतों में लोगों को जागरूक करें। घर-बार देखने, फसल काटने के बाद फिर आंदोलन को तेज करने के लिए लौट आएं।
हरमीत सिंह कादियान भी कहते हैं कि धरना-प्रदर्शन चल रहा है। अब यह निर्णायक मोड़ पर ही खत्म होगा। इसलिए लंबे आंदोलन को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई गई है। ताकि खेती-खलिहानी और किसान आंदोलन सब साथ-साथ चलता रहे। यही कारण है कि हर रोज कुछ शिविर हट रहे हैं और कुछ नए लग रहे हैं। किसानों के ट्रैक्टर घर की तरफ लौट रहे हैं और कामकाज की जिम्मेदारी निभाने के बाद फिर आंदोलन स्थलों पर आ रहे हैं।
दिल्ली से पंजाब जाने वाले हर हाईवे पर आपको गुरुजी का लंगर मिल जाएगा। यह लंगर आंदोलन से लौटते और आंदोलन में शामिल होने वाले किसानों के लिए लगातार चल रहा है। ताकि किसानों को आने-जाने में खाने-पीने की तकलीफ न होने पाए। इसके अलावा यह लंगर राहगीरों के लिए भी है। वह भी लुत्फ उठा सकते हैं। सेवादार इसे प्रबंधन कौशल के सहारे चला रहे हैं। अंबाला से कोई 10 किमी पहले लंगर के सेवादार तेजा सिंह का कहना है कि हर रोज हजारों लोग प्रसाद चखते हैं। यह सब कुछ स्थानीय मदद से चल रहा है।