किसानों की घटती आमदनी के लिए जलवायु परिवर्तन को मुख्य वजह बताते हुए वित्त मंत्री ने कहा है कि अब भारतीय कृषि पर जलवायु के प्रभाव का विशलेषण करने का समय आ गया है।
जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप कृषि से होने वाली वार्षिक आमदनी में औसतन 15 से 18 प्रतिशत की कमी और असिंचित क्षेत्रों में 20 से 25 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है। उन्होंने अनाज केंद्रीत खेती की समीक्षा की वकालत भी की है।
दरअसल
सरकार की मजबूरी यह है कि तमाम दुर्दशा के बावजूद देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 16 प्रतिशत है, तो रोजगार प्रदान करने के मामले में इसका योगदान 49 प्रतिशत है।
सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि कृषि के खराब निष्पादन के कारण मुद्रास्फीति, किसानों पर दबाव, उथल-पुथल तथा बड़े पैमाने पर राजनीतिक और सामाजिक हडकंप के हालात पैदा हो सकते हैं। बावजूद उसके सरकार ने कृषि क्षेत्र को संकट से उबारने के लिए कुछ खास प्रयासों का जिक्र आर्थिक सर्वेक्षण में नहीं किया है।
बल्कि जलवायु परिवर्तन पर सरकार के दावे उल्टे पड़ते दिख रहे हैं। खेती का रिकॉर्ड उत्पादन यह जाहिर करता है कि जलवायु परिवर्तन का कृषि पर असर नहीं है। अगर कृषि पर इसका असर होता तो इससे उत्पादन प्रभावित होता।
सरकार ने खुद उत्पादन में वृद्धि की बात स्वीकारी है। यानि की किसानों ने पहले से ज्यादा अनाज पैदा किया है। मगर उनकी आमदनी पहले से भी कम रही है। किसानों की आमदनी गिरने और जलवायु परिवर्तन को वजह बताने के सरकार के कदम पर देश के जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने भी चिंता जताई है।
जलवायु परिवर्तन से खेती को नुकसान की बात मुद्दे से ध्यान भटकाने की कवायद
अमर उजाला से बातचीत में कृषि अर्थशास्त्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से खेती को नुकसान की बात कर सरकार कृषि के असल मुद्दों से अपना ध्यान भटका रही है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का कृषि पर कोई असर नहीं है।
अनाज का रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन करते हुए किसानों ने 3.30 लाख टन अनाज का उत्पादन किया है। शर्मा के अनुसार किसानों की दुर्दशा की मुख्य वजह उन्हें उत्पाद की वाजिब कीमत न मिलना है।
किसानों को उनके उत्पाद का लाभकारी मूल्य देने के बजाय सरकार अन्य मुद्दों की ओर ध्यान भटका रही है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण सरीखे कदमों की चर्चा कर सरकार उन्हीं कदमों पर आगे बढ़ रही है जिसके वजह से देश की खेती और किसानी चौपट हुई है। सरकार सिद्धातों और विदेशी सुझावों पर ही आगे बढ़ रही है। शहरीकरण के बजाय सरकार को खेती को मुनाफे का सौदा बनाना चाहिए। ताकि शहरों से पलायन गांव की तरफ हो।