केंद्र सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने के लिए मजबूर कर चुके किसान दोबारा आंदोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। इसकी शुरूआत 31 जुलाई को पंजाब के सुनाम में बड़ी पंचायत से की जाएगी। इसके अलावा देश के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों को बंद करने के साथ आंदोलन किया जाएगा। अगस्त में देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर 75 स्थानों पर एक सप्ताह का प्रदर्शन कर केंद्र से सभी कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करने, लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के आरोपी मंत्री को सजा दिलाने की मांग की जाएगी। 22 अगस्त को जंतर-मंतर पर विशाल प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। किसानों के लश्कर में इस बार अग्निपथ योजना के विरोधी युवाओं का दस्ता भी मौजूद होगा। नाराज युवा इस आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार पर अग्निपथ योजना को वापस लेने का दबाव बनाएंगे। यदि किसानों के आंदोलन को युवाओं का साथ मिला तो 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी सरकार के लिए भारी मुश्किल खड़ी हो सकती है।
हालांकि, किसानों का ये आंदोलन उनकी आपसी फूट के बीच शुरू होने जा रहा है, जिससे इसकी सफलता को लेकर पहले दिन से संदेह खड़े किये जा रहे हैं। मंगलवार को किसान नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस में यह स्वीकार किया कि संयुक्त किसान मोर्चा के बीच अनेक किसान संगठन आंदोलन वापसी की रूपरेखा से सहमत नहीं थे। किसान आंदोलन की वापसी की चर्चा के बीच ही कुछ किसान नेताओं ने सरकार से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत शुरू कर दी थी, इसके लिए सरकार को पत्र लिखे जा रहे थे। साथ ही कई किसान संगठन पांच राज्यों के चुनावों में उतरने के लिए योजना बना रहे थे, जबकि संयुक्त किसान मोर्चा के ज्यादातर संगठनों को इसकी जानकारी तक नहीं थी। इससे किसान एकता को खतरा पैदा हो गया था।
आंदोलन के नेताओं द्वारा इस बार यह बात बताने की कोशिश की जाएगी कि केंद्र सरकार का हर बदलाव किसानों और उनके परिवार पर भारी पड़ रहा है। तीन कृषि कानूनों के जरिए पहले किसानों की जमीन छीनने की कोशिश की गई थी, तो अब अग्निपथ योजना के जरिए किसानों के बच्चों को दी जा रही नौकरी को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। सेनाओं के निचले स्तर पर सबसे ज्यादा किसान परिवारों के बच्चे ही नौकरी करते थे, जबकि इसी वर्ग को अग्निपथ योजना के अंतर्गत लाकर उनकी नौकरी का सबसे बड़ा जरिया खत्म कर दिया गया है। इस योजना का असली असर भी किसान परिवारों पर ही पड़ने वाला है।
माना जा रहा है कि यदि पिछली बार की तरह अग्निपथ योजना के विरोध में युवाओं का साथ मिला तो केंद्र सरकार के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। हालांकि, यह आंदोलन ऐसे दौर में शुरू किया जा रहा है, जब वायु सेना और थल सेना ने अग्निपथ योजना के अंतर्गत भर्तियां शुरू कर दी हैं और इसमें रिकॉर्ड संख्या में युवा शामिल होने के लिए सामने भी आ रहे हैं।
किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष चौधरी पुष्पेंद्र सिंह ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों से सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने के लिए एक कमेटी का गठन कर इस पर जल्द से जल्द निर्णय लेने की बात कही थी, लेकिन इस मामले में अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है। यही कारण है कि किसान एक बार फिर सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य हो रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा किसानों पर सभी मुकदमों की वापसी, लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के आरोपी भाजपा नेता को सजा दिलाने की मांग सबसे प्रमुख रहेगी। साथ ही किसान चाहते हैं कि सरकार विश्व व्यापार संगठनों के दबाव में आकर फसलों के बारे में गलत निर्णय न ले।
आंदोलन 11 दिसंबर को स्थगित होने के बाद कुछ किसान नेताओं ने चुनाव लड़ा, जिसमें जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया। उनके चुनाव लड़ने के फैसले से संयुक्त किसान मोर्चा की साख पर एक बहुत गहरा धब्बा लगा। पंजाब में चुनाव लड़ने वाले किसान नेताओं में से छह को बिना संयुक्त किसान मोर्चा की सर्वसम्मति के तीन जुलाई की संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में वापस ले लिया गया, जिससे आम किसानों में काफी नाराजगी है।
इन दोनों मुद्दों पर हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के 35 से अधिक संगठनों की बैठक हरियाणा के रतिया में चार जून को और बठिंडा में 25 जून को आयोजित की गई। इसमें तय किया गया कि संयुक्त किसान मोर्चा की आगामी बैठक में चिट्ठी लिखने के आरोपियों को न बुलाया जाए और चिट्ठी लिखने के मुद्दे पर चर्चा की जाए। यदि मीटिंग में उन्हें बुलाया भी जाता है, तो विस्तृत चर्चा के बाद जिन लोगों पर चिट्ठी लिखने का दोष साबित हो जाए, उन्हें फिर फैसला लेते समय वोट डालने का अधिकार न दिया जाए। आगामी बैठक में लखीमपुर खीरी वाले प्रकरण पर कोई बड़ा फैसला लिया जाए।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए पहले 20 जून और फिर 28 जून को एक चिट्ठी संयुक्त किसान मोर्चा की कोआर्डिनेशन कमेटी को भेजी गई, लेकिन उस कमेटी ने इन मुद्दों को अनसुना कर दिया। 20 और 28 जून को लिखे गए दोनों पत्रों का जवाब देने की बजाय डॉ. दर्शनपाल ने 28 जून की चिट्ठी को पब्लिक में वायरल कर मोर्चे की एकता को तोड़ने का प्रयास किया और एक तुगलकी फरमान जारी करते हुए एक सोची-समझी रणनीति के तहत कहा कि आगामी बैठक में राष्ट्रीय संगठनों के हर राज्य से एक व्यक्ति को बुलाया जाएगा और पंजाब के नए संगठनों को मीटिंग में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।
किसान नेताओं का आरोप है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा था, ताकि मीटिंग में उनका बहुमत बन सके और वे बहुमत के आधार पर सरकार को चिट्ठी लिखे जाने के मुद्दे को दबा सकें और चुनाव लड़ने वाले नेताओं का दोबारा संयुक्त किसान मोर्चा में प्रवेश करा सकें। हमने इन नए नियमों पर सख्त एतराज जताया। हमने तीन जुलाई के बाद भी एक सप्ताह तक हमारी चिट्ठी का जवाब आने का इंतजार किया, लेकिन कोई जवाब नहीं आया तो आज हम मीटिंग के बाद प्रेस के माध्यम से देश के सभी किसान भाइयों तक ये बातें पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
किसान नेताओं की इस आपसी खींचतान और सियासत के बीच जब 19 नवम्बर को देश के प्रधानमंत्री ने टीवी पर घोषणा की कि वे तीनों कृषि कानून वापस ले रहे हैं, उसके बाद सरकार को चोरी-छुपे चिट्ठी लिखने में शामिल किसान नेताओं ने जल्द से जल्द आंदोलन समाप्त करने का प्रयास करते हुए अपने-अपने संगठनों की ट्रॉलियों को वापस भेजने लगे। उन्होंने बिना सलाह-मशविरा किए अपने तंबू उखाड़ना शुरू कर दिया। बयान में कहा गया है कि साथियों ने MSP के मुद्दे पर आंदोलन जारी रखने का आह्वान किया, लेकिन मोर्चा की एकता को बनाये रखने के लिए बड़े भारी मन से हमें यह निर्णय लेना पड़ा कि आंदोलन स्थगित किया जाए।
अब यह तय किया गया है कि 31 जुलाई को पंजाब के सुनाम में शहीद उधम सिंह जी के शहीदी दिवस पर पंजाब के सुनाम में विशाल पंचायत आयोजित की जाएगी। 22 अगस्त को जंतर-मंतर पर बड़ी पंचायत आयोजित की जाएगी। 23 अगस्त को संयुक्त किसान मोर्चा की अगली बैठक आयोजित की जाएगी।