बुंदेलखंड के गांव-गांव में फैला साहूकारों का जाल
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मऊरानीपुर ब्लॉक के मैलोनी गांव की शांति की उम्र महज 25 साल है, लेकिन उसके चेहरे पर यौवन की लोच नहीं पथरीली जमीन सी कठोरता दिखती है। आंखों में जिंदगी की चमक नहीं, बल्कि दम तोड़ती उम्मीदों का दर्द और अंधेरा झलकता है। खूबसूरत जिंदगी के सपने संजोने की उम्र में उसके नाजुक कंधों पर है पहाड़ सी जिंदगी का बोझ उठाने की जिम्मेदारी...।
यह तो महज नजीर है। सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड में बंजर होती धरती और साहूकारों की मनमानी से जूझ रहे हजारों परिवार ऐसे ही संकट का सामना कर रहे हैं। गरीब परिवारों की जिंदगी के अंधेरे और रुपयों की चमक में जी रहे साहूकारों की दादागीरी को उद्घाटित करती विकास सनाड्य की ग्राउंड विशेष रिपोर्ट :
किसान की मौत पर भी नहीं पसीजे साहूकार
शांति के पति हीरालाल (27) सात बीघा जमीन के कास्तकार थे। उन्होंने अपनी कृषि संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए साहूकारों से महज एक लाख रुपये का कर्ज लिया था, जो बढ़कर ढाई लाख रुपये पर पहुंच गया। उस पर कुदरत भी दगा दे गई। पहले ओलावृष्टि व अतिवृष्टि ने कहर ढाया और रही सही कसर सूखे ने पूरी कर दी।
खेती के साथ बर्बाद होती जिंदगी और आए दिन साहूकारों की धौंस युवा किसान बर्दाश्त नहीं कर सका और उसने खेत के पास से निकली रेल लाइन पर ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। लेकिन, इतने पर भी साहूकारों का दिल नहीं पसीजा। शांति ने बताया कि पति की मौत के बाद भी आए दिन साहूकार उसके घर आकर धमकाते हैं। वह कर्ज के बदले जमीन उनके नाम लिखने का दबाव बना रहे हैं। हर आहट पर उन्हें डर लगा रहता है। समझ में नहीं आ रहा कि वह क्या करें? ले देकर उनके पास जमीन ही बची है, लेकिन यह भी हाथ से निकल गई तो क्या होगा?
कर्ज न चुकाने पर साहूकार ने हड़प ली जमीन
कर्ज न चुकाने पर साहूकार ने हड़प ली जमीन
ब्लाक बंगरा के ग्राम खिसनी बुजुर्ग के किसान सुम्मेर सिंह की गांव के अच्छे किसानों में गिनती होती थी। उनके पास पंद्रह बीघा जमीन थी। जमीन पर पंप सेट लगाने के लिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से सोलह हजार रुपये का कर्ज लिया था। खेती खराब हो गई और कर्ज की रकम बढ़कर 28 हजार पर पहुंच गई। बैंक की इस रकम की अदायगी के लिए उन्होंने साहूकार से चालीस हजार रुपये का कर्ज दो प्रतिशत मासिक ब्याज पर लिया।
बदले में अपनी जमीन गिरवीं रखी। इसके बाद वह अपनी जमीन साहूकार से नहीं छुड़ा सके। कर्ज बढ़ता गया और एक दिन ऐसा आया कि उनकी पूरी जमीन उनके हाथ से निकलकर साहूकार के खाते में चली गई। दो साल पहले गांव में बना उनका कच्चा मकान भी ढह गया। इसकी मरम्मत कराने को उनके पास पैसा नहीं है। रहम खाकर गांव के ग्राम प्रधान के परिवार ने उन्हें जानवर बांधने वाले बाड़े में जगह दे दी है, जिसमें वह परिवार समेत रहते हैं।
मऊरानीपुर के ग्राम तिलैना का युवा कृषक रघुराज (30) के पास चार बीघा जमीन थी। कृषि संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए रघुराज ने गांव के साहूकार से अपनी दो बीघा जमीन गिरवीं रखकर एक लाख रुपये का कर्ज लिया था, जिसकी फसल खराब होने से वह अदायगी नहीं कर पाया। इससे कर्ज बढ़कर एक लाख साठ हजार रुपये पर पहुंच गया। खेती की लगातार खराब होती दशा से रघुराज पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा था।
यह बात उसे दिनों दिन खाए जा रही थी और उसने तीन माह पहले जहर खाकर आत्महत्या कर ली। पीछे छोड़ गया विधवा बूढ़ी मां, पत्नी और तीन मासूम बच्चे। मां जानकी ने बताया कि पति की मौत के बाद रघुराज ही घर का सहारा था। लेकिन, वह भी अब साथ छोड़ गया और जमीन भी आधी बची। उस पर भी इस बार अन्न का एक दाना भी नहीं हुआ। अब आगे परिवार कैसे चलेगा और कर्ज कैसे चुकेगा? यह उसकी समझ में नहीं आ रहा है। अब बस बेटे के बच्चों को जिंदा रखने के लिए ही वह जिंदा हैं।
किसानों का काल बना ‘मुहायदा’
किसानों का काल बना ‘मुहायदा’
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इन दिनों बुंदेलखंड के गांव-गांव में ‘मुहायदा’ शब्द सुनाई दे रहा है। उर्दू भाषा के इस शब्द का मतलब है एग्रीमेंट। साहूकार किसानों को कर्ज मुहायदा कराकर बांट रहे हैं। वह किसानों से उनकी जमीन का सब रजिस्ट्रार कार्यालय में मुहायदा करा लेते हैं। इसमें वह किसानों से उनकी जमीन अपने नाम लिखा लेते हैं, जिसमें रकम ब्याज जोड़कर खोल दी जाती है।
तय अवधि में किसान ब्याज समेत साहूकारों को रकम की अदायगी कर देता है, तो सब रजिस्ट्रार कार्यालय में मुहायदा कैंसल करा लिया जाता है। अन्यथा की स्थिति में जमीन साहूकार की हो जाती है। अधिवक्ता नरेश पुरोहित के अनुसार मुहायदा के आधार पर किसानों को कानूनी प्रक्रिया उलझा दिया जाता है। मुहायदा होने के बाद किसान के सामने दो ही रास्ते बचते हैं, या तो वह ब्याज समेत कर्ज चुकाए या जमीन साहूकार को दे दे।
मुहायदा पर रोक लगाए सरकार
भारतीय किसान यूनियन (भानु) के अध्यक्ष शिवनारायण से परिहार ने बताया कि मुहायदा किसानों के लिए जी का जंजाल बना हुआ है। कीमती जमीन का साहूकार औने पौने दामों में मुहायदा करा लेते हैं। किसान रकम वापस नहीं कर पाता है और जमीन साहूकार की हो जाती है। इस पर सरकार को तत्काल रोक लगानी चाहिए। अन्यथा की स्थिति में छोटे किसान बहुत जल्द भूमिहीन हो जाएंगे।