अखिल भारतीय किसान आंदोलन समन्वय समिति के राकेश टिकैत, सेलामैंटू, विजयज वंधिया, भाकियु के युद्धवीर सिंह ने कहा अगर केंद्र सरकार उनकी सुनवाई नहीं करती तो किसान देश व्यापी आंदोलन के लिए विवश होंगे।
इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कामर्स मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर समझौते को रोकने के लिए कहा है। किसानों का दावा है कि इससे केवल आयात बढ़ेगा क्योंकि उन्नत तकनीकों के चलते हम निर्यात करने में सक्षम नहीं हैं।
उन्होंने कहा भारत में डेयरी उधोग 15 करोड़ परिवारों को आजीविका प्रदान करता है। जबकि नीति आयोग का अनुमान है कि भारत 2033 तक भारत की जरूरत के मुताबिक दुग्ध और उससे जुड़े उत्पाद की सप्लाई 330 मीट्रिक टन तक पहुंचेगा।
यह राष्ट्रीय मांग से 292 मीट्रिकटन से कहीं ज्यादा है। ऐसे में भारत को इस समझौते की जरूरत क्यों है। तमिलनाडु संघ के मुखिया सेलामैटू ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए इस कवायद में जुटा है।
किसान नेता युद्धवीर सिंह ने कहा इस समझौते की शर्तें विश्व व्यापार संगठन से ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि यह देश भारत की कृषि और वस्तुओं पर लगने वाले शुल्क को एक मुश्त घटाने का दबाव बनाएगा। इसके अलावा आरसीईपी विदेशी कंपनियों को बीज और पेटेंट में छूट देगा जिससे छोटे और मझोले किसानों के हक पर असर डालेगी।
उन्होंने कहा न्यूजीलैंड का तर्क है कि वह केवल पांच फीसदी दुग्द उत्पाद बाजार में उतारेगा जोकि भारत केकुल उपयोग का एक तिहाई होगा। किसान नेताओ ने एलान किया कि यदि जल्द ही भारत सरकार ने अपना पक्ष साफ नहीं किया तो किसानों को देश व्यापी आदोंलन के लिए विवश होना पड़ेगा।