फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

देश भर के किसानों ने फूंका आईसीईपी के विरोध का बिगुल, यह है पूरा मामला

Thu, 01 Aug 2019 03:24 AM IST
Nilesh Kumar अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली 
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
विज्ञापन

किसानों ने केंद्र सरकार के 16 देशों के साथ क्षेत्रीय व्यापक आथक भागेदारी (रिजीनल कॉप्रेहैंसिव इकॉनिमिक पार्टनरशिप यानी आरसीईपी) का विरोध किया है। किसान संगठनों ने बुधवार को दिल्ली में कहा अगर केंद्र सरकार आसियान देशों के साथ इस समझौते को करती है तो इसका सीधा असर 15 करोड़ डेयरी किसानों की रोजी-रोटी पर पड़ेगा।  किसानों ने पीएम और वित्तमंत्री से तुरंत कार्रवाई का अनुरोध किया है।  किसान संगठनों ने कहा  अगर सुनवाई नहीं हुई तो देश भर के किसान  देश व्यापी आंदोलन छेड़ेंगे। 

विज्ञापन

  
भारत सरकार आसियान कंट्री चीन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, जापान सरीखे देशों के साथ मुक्त व्यापार के लिए समझौता  में आगे बढ़ रही है।  सरकार की इस पहल का देश भर केकिसान संगठन लगातार विरोध कर रहे हैं। संगठनों ने दावा किया है कि अगर यह समझौता होता है तो पिछले साल 2018-19 में आसियान ब्लॉक जिसके साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता है, से सस्ते आयात को मंजूरी देकर 26 हजार करोड़ का घाटा खा चुका है।  

ऐसे में यदि  पूरा समझौता हो जाता है तो डेयरी सेक्टर और कृषि पर आधारित  लोगों की आजीविका, बीजों  आदि  पर विदेशी कंपनियों और कारपोरेट का कब्जा हो जाएगा।  इसलिए उन्होंने केंद्र सरकार से दुनिया के एकमात्र छोटे और मझोले किसानों वाले देश के अन्नदाता  को बचाने की गुहार की है।  

विज्ञापन
Trending Videos

अखिल भारतीय किसान आंदोलन समन्वय समिति के राकेश टिकैत, सेलामैंटू, विजयज वंधिया,  भाकियु के युद्धवीर सिंह ने कहा अगर केंद्र सरकार उनकी सुनवाई नहीं करती तो किसान देश व्यापी आंदोलन के लिए विवश होंगे।  

इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कामर्स मंत्री निर्मला सीतारमण  को पत्र लिखकर समझौते को रोकने के लिए कहा है।  किसानों का दावा है कि इससे केवल आयात बढ़ेगा क्योंकि उन्नत तकनीकों के चलते हम निर्यात करने में सक्षम नहीं हैं।  

उन्होंने कहा भारत में डेयरी उधोग  15 करोड़ परिवारों को आजीविका प्रदान करता है।  जबकि नीति आयोग का अनुमान है कि भारत 2033 तक भारत की जरूरत के मुताबिक दुग्ध और उससे जुड़े उत्पाद  की सप्लाई 330 मीट्रिक टन तक पहुंचेगा।  

यह राष्ट्रीय मांग से 292 मीट्रिकटन से कहीं ज्यादा है।  ऐसे में भारत को इस समझौते की जरूरत क्यों है। तमिलनाडु संघ के मुखिया सेलामैटू ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए  इस कवायद में जुटा है।  
विज्ञापन

किसान नेता युद्धवीर सिंह ने कहा इस समझौते  की शर्तें विश्व व्यापार संगठन से ज्यादा खतरनाक है। क्योंकि यह देश भारत की कृषि और वस्तुओं पर लगने वाले शुल्क को एक मुश्त घटाने  का दबाव बनाएगा।  इसके अलावा आरसीईपी विदेशी कंपनियों को बीज और पेटेंट में छूट देगा जिससे छोटे और मझोले किसानों के हक पर असर डालेगी।  

उन्होंने कहा न्यूजीलैंड का तर्क है कि वह केवल पांच फीसदी दुग्द उत्पाद बाजार में उतारेगा जोकि भारत केकुल उपयोग का एक तिहाई होगा। किसान नेताओ ने एलान किया कि यदि जल्द ही भारत सरकार ने अपना पक्ष साफ नहीं किया तो किसानों को देश व्यापी आदोंलन के लिए विवश होना पड़ेगा।  
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें