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किसान आंदोलन : कहां चूक गए केंद्र सरकार के रणनीतिकार, क्यों फूल रही हैं सांसें?

Fri, 25 Dec 2020 04:45 PM IST
दीप्ति मिश्रा शशिधर पाठक, नई दिल्ली

सार

  • किसानों के ऑपरेशन मैनेजमेंट का आकलन करने में चूक गई सरकार
  • पंजाब बनाम अन्य राज्यों के किसान की रणनीति भी नहीं आ रही है काम
  • आंदोलन को बदनाम करने की रणनीति भी पड़ गई भारी
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किसान आंदोलन
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विस्तार
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दिल्ली बॉर्डर के पास चल रहे किसान आंदोलन को लेकर ऊहापोह की स्थिति है, केंद्र सरकार के रणनीतिकार भी कोई रास्ता नहीं निकाल पा रहे हैं। ऐसे में वहां डटे किसान संगठनों के नेताओं से बात कीजिए तो वह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पर सभी केंद्रीय मंत्रियों से ज्यादा भरोसा करते नजर आते हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के प्रति भी उनकी सहानुभूति है, लेकिन उनकी बड़ी नाराजगी किसान आंदोलन को बदनाम करने वाले भाजपा के नेताओं से है। किसान नेता हरेन्द्र सिंह लखूवाल, वीएम सिंह, किसान मामलों के जानकार चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह समेत तमाम नेताओं का कहना है कि सरकार किसानों को उनका हक देने के बजाय इसे नाक का सवाल बना रही है। सरकार बातचीत का दिखावा कर रही है, लेकिन खुले मन से बातचीत नहीं कर रही है।

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पुष्पेन्द्र सिंह और वीएम सिंह का कहना है कि किसान एमएसपी पर खरीद की गारंटी मांग रहा है। किसान चाहता है कि उसकी उपज को सरकार, निजी कंपनियां या आढ़ती कोई भी केवल सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही खरीदे। न्यूनतम समर्थन मूल्य स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के आधार पर लागू हो। पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में इसका वादा किया था और प्रधानमंत्री ने भी चुनाव प्रचार में किसानों को यह भरोसा दिया था, लेकिन सरकार एमएसपी पर खरीद को जारी रखने की बात कहकर लोगों को बरगलाने में लगी है।

किसानों को आंकने में चूक गए सरकार के रणनीतिकार
केंद्र सरकार के अधिकारियों की बात करें तो कृषि मंत्रालय के एक बड़े अधिकारी को सिंघु बार्डर पर किसानों के आंदोलन प्रबंधन पर ताज्जुब हो रहा है। बड़े अधिकारियों को लग रहा था कि किसान दिल्ली की कड़ाके की ठंड में इतनी बड़ी तादाद में लंबे समय तक नहीं टिक पाएंगे। उन्हें हारकर वापस लौटना पड़ेगा।
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फसल की बुआई करके आए हैं किसान
इसके उलट किसानों के हौसले काफी बुलंद हैं। पंजाब से दिल्ली के बॉर्डर तक पहुंचे किसानों के पास लंबे समय तक आंदोलन चलाने के लिए सारा इंतजाम है। वह गेहूं की बुआई करके आए हैं। धान की उपज व्यवस्थित करके मैदान में डटे हैं। उनके पास ठंड से निबटने के लिए लकड़ी, कोयले वाला गीजर, रोशनी के लिए सोलर पैनल, गरम रखने के लिए कंबल, टेंट, खाना बनाने, खाने, लंगर चलाते रहने के लिए पूरा व्यवस्थित इंतजाम है। एक बड़े किसान नेता का कहना है कि वह जब विज्ञान भवन में अपनी बातें रख रहे थे, तो सरकार के अफसर ध्यान से सुन रहे थे। सूत्र का कहना है कि सरकार के अफसरों को पता चल गया है कि हम किसान उनके तीनों कानूनों की बारीकियों को समझते हैं।

सरकार को हमारे हौसले का अंदाजा होना चाहिए : लखूवाल
किसान हरेन्द्र सिंह लखूवाल का हौसला देखते ही बनता है। परमजीत सिंह कहते हैं कि सरकार किसानों के आंदोलन को तोड़ने में लगी है। हर दिन केंद्र सरकार के कृषि मंत्री तीनों कानूनों को समर्थन देने वाले कई किसान अनुयाइयों से मिल रहे हैं। मनिंदर सिंह बीच में टोकते हुए कहते हैं कि अगर केंद्र सरकार के पास इतना ही समय और संवेदनशीलता हम किसानों के लिए होती, तो समस्या का समाधान निकल आता।

दिल्ली के हरजिंदर सिंह किसानों को समर्थन देने के लिए पहुंचे हैं। उनका कहना है कि केंद्र सरकार को किसानों के हौसले का अंदाजा होना चाहिए। उसे समझना चाहिए कि किसान मांग नहीं बल्कि अपना दर्द लेकर आए हैं और इसे भाजपा राजनीति से प्रेरित, आढ़तियों, बिचौलियों का आंदोलन बता रही है। इससे लग रहा है कि केंद्र सरकार किसानों के मुद्दे को लेकर गंभीर नहीं है।

किसान नेता वीएम सिंह जैसे नेताओं को पंजाब के किसानों ने सिंघु बॉर्डर से लौटा दिया था। वह गाजीपुर बॉर्डर पर आ डटे हैं। भाकियू के किसान नेताओं को खुलकर पंजाब के किसानों के साथ आना पड़ा। गुरुदासपुर के किसान नेता का कहना है कि हमें कोई चिंता नहीं है। धीरे-धीरे आंदोलन देश में फैल रहा है और किसान के हर शुभचिंतक को हमारे साथ आना ही होगा।

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दोनों की नाक बची रहे, तो अच्छा है

किसानों के बीच समाधान का रास्ता पूछने पर किसान नेता कहते हैं कि उनका मकसद सरकार को नीचा दिखाना नहीं है। वह केवल अपना दर्द लेकर आए हैं, लेकिन सरकार जानबूझकर अपनी नाक ऊंचा कर रही है। वीएम सिंह भी कहते हैं कि सरकार को नीचा दिखाना मकसद नहीं है। सरकार को भी चाहिए कि वह किसानों के आंदोलन को नीचा दिखाने का प्रयास छोड़ दें। वीएम सिंह मानते हैं कि बहुत रायता फैल चुका है। बिना सकारात्मक समाधान के इसका रास्ता निकलना कठिन है। किसान भी आसानी से झुकने वाले नहीं हैं।

एमएसपी की गारंंटी दे सरकार
क्या होना चाहिए के सवाल पर किसान नेताओं का कहना है कि सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी की मांग सरकार को मान लेनी चाहिए। इसे मानते ही सब ठीक होने लगेगा। किसान नेता कहते हैं कि कृषि मंत्री ने इस मांग को मानने पर 10-12 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ने की बात कही है। इसका अर्थ हुआ कि किसान हर साल 10-12 लाख करोड़ रुपये का नुकसान बर्दाश्त कर रहे हैं।

पुष्पेन्द्र सिंह कहते हैं कि सरकार एमएसपी पर खरीद की गारंटी देने पर यह खरीद तो निजी कंपनियां, व्यापारी, आढ़ती करेंगे। इसलिए मेरी समझ में नहीं आता कि केंद्र सरकार निजी खरीददारों, बिचौलियों, कंपनियों के हितों की रक्षा क्यों कर रही है। किसानों के मामले में क्यों तंग रवैया अपना रही है? किसान नेताओं का कहना है कि सरकार फिलहाल अभी तीनों कानूनों को मुद्दे का समाधान होने तक निलंबित रखना चाहिए।

क्या है केंद्र सरकार की रणनीति?
संयुक्त सचिव विवेक अग्रवाल का 24 दिसंबर को किसानों को नया पत्र मिला। किसान नेताओं को समझ में नहीं आया कि यह पहले के पत्र से अलग कैसे है? पांच दौर की वार्ता पर किसान नेताओं का कहना है कि केंद्र सरकार अपनी जिद पर अड़ी है और किसान अपने हित की मांग पर। नाम न छापने के भरोसे पर एक किसान नेता का कहना है कि केंद्र सरकार तीनों कानूनों में 16 संशोधनों के लिए तैयार है, आश्वासन दे रही है। लेकिन ये संशोधन नाकाफी हैं। जो मुख्य बदलाव होना चाहिए उस पर केंद्र सरकार का रवैया ढीला है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार तीनों कानूनों को रद्द करने के पक्ष में कतई नहीं है। ऐसे में सरकार किसानों से बातचीत का संदेश देने, देश के 9 करोड़ किसानों को दो हजार रुपये की किश्त भेजकर सीमांत, लघु और मझोले किसानों में सकारात्मक संदेश देने, देश भर में छोटे-छोटे किसान संगठनों का समर्थन पाने की रणनीति पर चल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी लगातार किसान हितैषी होने का संदेश दे रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और पीयूष गोयल भी किसान मुद्दे के समाधान के लिए लगातार सक्रिय हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस रास्ता निकलता नहीं दिख रहा है।
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