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किसान आंदोलन में कहीं माहौल बिगाड़ने की ‘बाहरी’ साजिश तो नहीं

Mon, 14 Dec 2020 06:41 AM IST
देव कश्यप हरि वर्मा, नई दिल्ली

सार

  • किसान नेताओं ने सोमवार को गांधीवादी उपवास की रणनीति बनाई
  • अमेरिका में खलिस्तान समर्थकों ने गांधी प्रतिमा का अपमान किया
  • अमेरिका की घटना की निंदा करते हुए किसान संगठनों की सतर्कता
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वॉशिंगटन में लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा के साथ किया गया कृत्य - फोटो : Twitter
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विस्तार
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किसान आंदोलन में सिंघु बॉर्डर पर जब सोमवार की प्रस्तावित गांधीवादी भूख हड़ताल व जिला मुख्यालयों पर देशव्यापी प्रदर्शन पर अमल की रणनीति बनाई जा रही थी, तभी सात समंदर पार अमेरिका में भारतीय दूतावास के बाहर खलिस्तान समर्थकों के गांधी प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने की निंदनीय खबर आई। कहीं यह देश में शांति से चल रहे किसान आंदोलन में बातचीत के बन रहे माहौल को बिगाड़ने की ‘बाहरी’ साजिश तो नहीं। आंदोलनकारी किसान मोर्चे ने अमेरिका में गांधी प्रतिमा की घटना की निंदा की और अपने आंदोलन के लिए सतर्कता बढ़ा दी है।

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अंदेशा क्यों?
दरअसल, केंद्र और पंजाब सरकार सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। खुफिया इनपुट्स ऐसी आशंकाएं जता चुकी हैं। कई केंद्रीय मंत्री किसानों को ऐसी साजिश को लेकर इशारे में सतर्क कर रहे हैं। पिछले दिनों पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद सुरक्षा को लेकर इशारा कर चुके हैं। वैसे, सच तो यह है कि खाड़कू-आतंकवाद का दंश झेल चुके पंजाब और पंजाबी किसान किसी कीमत पर ऐसी ताकतों की कठपुतली नहीं बनने वाले लेकिन मुट्ठी भर ‘बाहर’ की साजिश के अंदेशे से इनकार भी नहीं किया जा सकता। अंदेशा है ऐसे ‘बाहरी’ माहौल बिगाड़ने की ताक में हो सकते हैं।

कई संदिग्ध रडार पर
पंजाब में कांग्रेस की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने केंद्र के नए तीनों कृषि सुधार कानूनों का विरोध विधानसभा में किया। वहां किसान संगठनों के रेल, मॉल, टोल बंद कराने पर आंखें मूंदकर ‘समर्थन’तक दिया लेकिन उसी कैप्टन की सरकार और पंजाब पुलिस की चिंता वाजिब है। ‘बाहरी साजिश’ के अंदेशे पर अकेले बठिंडा जिले में दस और पूरे पंजाब में कई संदिग्धों की कुंडली खंगाली गई। ऐसे किसी संदिग्ध पर मुकदमे तो दर्ज नहीं लेकिन रडार पर जरूर हैं।
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संयोग या प्रयोग
यह महज संयोग नहीं कि इससे पहले 12 दिसंबर के आंदोलन से दो दिन पहले 10 दिसंबर को भी जब किसान जत्थेबंदियां देशव्यापी टोल फ्री कराने की रणनीति बना रही थी, तभी मानवाधिकार के नाम पर किसानों के एक आंदोलनस्थल के पास विचारकों (भीमा कोरेगांव) के साथ-साथ दिल्ली दंगा के आरोपियों की रिहाई के समर्थन में पोस्टर लहराए गए थे। इन पोस्टरों के निवेदक में भारतीय किसान (उगराहा) का नाम था। भाकियू उगराहा ने ही अमित शाह के साथ बातचीत में जाने के संयुक्त मोर्चे के फैसले पर आपत्ति जताई थी। भाकियू डकौंदा के मंजीत धनेर का कहना है कि विरोध में बोलने वालों को सरकार यूं ही खलिस्तानी, आतंकी, नक्सली, वामपंथी करार देती है।

किसान संगठन भी सतर्क
संयुक्त मोर्चा और पंजाब की किसान जत्थेबंदियों ने भी शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन में बाहरी साजिश के अंदेशे को लेकर एहतियातन सतर्कता बरती है। मोर्चे और जत्थेबंदियों ने मिलकर एक कमेटी बनाई है जो न केवल निगरानी रखेंगी बल्कि ‘बाहरी’और सियासी दलों को दखल से रोकेंगी। सोमवार को आंदोलन से जुड़ी प्रमुख जत्थेबंदियों के एक-एक नेता सिंघु बॉर्डर पर बड़े मंच पर सुबह से शाम तक उपवास रखेंगे। मोर्चे ने इसमें सियासी दलों के नेताओं से परहेज करने का फैसला लिया है। संयुक्त मोर्चे और पंजाब जत्थेबंदी के निगरानी करने वाले सदस्य छोटे स्तर के आंदोलनकारियों को गलत करने से रोकेंगे।

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