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किसान आंदोलन: आत्मविश्वास में सरकार मगर सहयोगियों का भरोसा हिला

Wed, 02 Dec 2020 06:34 AM IST
Amit Mandal हिमांशु मिश्र

सार

  • कृषि कानून पर आरएलपी के बाद अब जेजेपी ने जताई चिंता
  • नए कानून में एमएसपी को शामिल करने की रखी मांग
  • अकाली दल पहले ही कर चुका है सरकार से किनारा
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किसानों का प्रदर्शन - फोटो : PTI
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विस्तार
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नए कृषि कानूनों पर सरकार भले ही आत्मविश्वास से भरी है, मगर राजग में शामिल दलों की चिंता में लगातार इजाफा हो रहा है। सोमवार को भाजपा की सहयोगी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के बाद अब जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) ने नए कानूनों पर चिंता जताते हुए किसानों की समस्या का जल्द समाधान करने की मांग की है। पार्टी ने किसानों की मांगों का समर्थन करते हुए सरकार से नए कृषि कानूनों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को जारी रखने संबंधी आश्वासन को शामिल करने की मांग की है।

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गौरतलब है कि तीन नए कृषि बिलों के कानूनी जामा पहनने के बाद भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक शिरोमणि अकाली दल ने केंद्र सरकार और राजग से दूरी बना ली। इसके बाद सोमवार को आरएलपी के मुखिया और सांसद हनुमान बेनीवाल ने नए कानूनों को वापस नहीं लेने पर राजग से हटने की धमकी दी। अब मंगलवार को जेजेपी ने किसानों की मांग का समर्थन करते हुए नए कानूनों में एमएसपी जारी रखने का लिखित आश्वासन देने की मांग की। भाजपा के लिए मुश्किल यह है कि हरियाणा में उसकी सरकार जेजेपी की बैसाखी पर टिकी है।
जेजेपी के अध्यक्ष अजय चौटाला ने कहा कि सरकार को किसानों की समस्या का जल्द से जल्द हल निकालना चाहिए। किसानों की मांग के अनुरूप कृषि कानूनों में एमएसपी को शामिल करना चाहिए। देश के अन्नदाता सड़कों पर परेशान हो रहे हैं। ऐसे में सरकार को अपना दिल बड़ा करते हुए किसानों की मांगों को स्वीकार करना चाहिए।
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क्यों चिंतित हैं सहयोगी
दरअसल चाहे एनडीए से नाता तोड़ने वाला अकाली दल हो या चेतावनी देने वाली आरएलपी या जेजेपी, इन दलों का समर्थक वोट बैंक किसानों का है। किसानों की नाराजगी को देखते हुए अकाली दल ने राजग और मोदी सरकार से नाता तोड़ा। चूंकि आंदोलनकारियों में जाट बिरादरी मुख्य रूप से शामिल है, और यही जेजेपी के साथ आरएलपी का मुख्य वोट बैंक है। इसलिए ये दल इस मामले में असमंजस में फंसे हैं। जेजेपी और आरएलपी दोनों किसान समर्थक पार्टी होने का दावा भी करती हैं। ऐसे में किसानों के आंदोलन से इन दलों की चिंता बढ़ गई है।

इसलिए दबाव में आई सरकार
किसान आंदोलन का दायरा लगातार बढ़ने और सहयोगी दलों के किसानों के साथ खड़े होने से सरकार की चिंता बढ़ी है। इससे पहले किसानों के अपने अपने राज्यों में प्रदर्शन और रेल पटरियों पर कब्जे के बावजूद सरकार और भाजपा निश्चिंत थी। मगर आंदोलन का फलक लगातार बड़ा होने और सहयोगियों की नाराजगी बढ़ने के कारण सरकार दबाव में है। इसी दबाव के कारण सरकार ने अचानक मंगलवार को किसान यूनियन के प्रतिनिधियों को बातचीत का न्यौता दिया।

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