किसान आंदोलन में जब बाजी पलटी तो राकेश टिकैत के सिर पर ताज आ गया। वे आंदोलन का प्रमुख चेहरा बन बैठे। दो माह से चल रहे आंदोलन का स्वरूप बदल गया। पंजाब मॉडल खत्म और टिकैत मॉडल शुरू। टिकैत के मंच पर जिस तरह से राजनेताओं की भीड़ जुट रही है, उससे कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी भी ऐसी शंका जता रहे हैं। वे कहते हैं, राकेश टिकैत को सावधानी से कदम रखना होगा। उन पर लगा कमजोर कड़ी का टैग हटना बहुत जरूरी है। उन्हें शतरंज की इस बिसात पर साबित करना पड़ेगा कि वे राजा की मेहरबानी पर आगे नहीं बढ़ रहे हैं।
किसान आंदोलन में शामिल कई संगठनों ने जिस तरह से हाथ पीछे खींचा है, उनसे टिकैत को तालमेल करना होगा। हरियाणा में आरक्षण आंदोलन के बाद यशपाल मलिक की जो छवि बनी थी, राकेश टिकैत के लिए उससे बाहर निकलना आवश्यक है। यह अलग बात है कि वे जिस पार्टी के खिलाफ किसान आंदोलन की अगुआई कर रहे हैं, उसे आंदोलन कैश करने में खासी महारत हासिल है।
जानकारों के मुताबिक भाजपा को बड़े आंदोलनों का अच्छे से फायदा उठाना आता है। अन्ना हजारे का आंदोलन हो या हरियाणा का जाट आरक्षण आंदोलन, भाजपा ने इनका फायदा उठाने में चूक नहीं की।
गणतंत्र दिवस की घटना के बाद राकेश टिकैत का एकाएक मुख्य फ्रेम में आना, यूपी न जाकर हरियाणा पहुंचना, दिल्ली पुलिस की गिरफ्तारी से बचना व केंद्र सरकार और टिकैत का एक दूसरे को लेकर शिथिलता का भाव, ये सब बातें कहीं न कहीं संदेह पैदा करती हुई नजर आती हैं। अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष दीपक राठी के मुताबिक, राकेश टिकैत को राजनीतिक साजिशों से खुद को बचाना होगा। दरअसल, उनके लिए अभी यही बड़ी चुनौती है।
ये बात सब जानते हैं कि पंजाब के ज्यादातर किसान संगठनों को तोड़ना आसान नहीं था। आंदोलन में शामिल अधिकांश सिख चेहरे, तीनों कानूनों को रद्द करने से कम किसी भी प्रस्ताव पर राजी नहीं हो रहे थे। सरकार यह चाहती थी कि किसी तरह इनमें अलगाव की स्थिति बन जाए। गणतंत्र दिवस पर लालकिला में हुए उपद्रव ने सरकार को यह अवसर भी दे दिया। उसके बाद ही राकेश टिकैत पूरे मंच पर काबिज हो गए।
बतौर दीपक राठी, गाजीपुर में अब टिकैत समर्थकों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा है। उनके भाई नरेश टिकैत ने पश्चिमी यूपी की कमान संभाल ली है। राकेश टिकैत, हरियाणा में निकल पड़े हैं। हो सकता है कि वे पंजाब और राजस्थान भी जाएं। देखने वाली बात यह भी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस समय भाजपा के पास कोई बड़ा जाट नेता नहीं है। आंदोलनों की बात करें तो अधिकांश नेता किसी न किसी पार्टी से जुड़कर ही खुद की छवि को बरकरार रख सके हैं। टिकैत परिवार भी इन्हीं में से एक है।
वहां चौधरी चरण सिंह परिवार के अजीत सिंह और जयंत चौधरी की राजनीति को झटका देने में टिकैत परिवार ने भाजपा की मदद की है। मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक किसान आंदोलन को लेकर केंद्र को आंख दिखा चुके हैं। मलिक के बयान से भाजपा और केंद्र सरकार असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। सत्यपाल सिंह और संजीव बालियान भी राजनीतिक मैदान में कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा, राजनीतिक पटल पर टिकैत परिवार को आगे ला सकती है।
अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के अध्यक्ष का कहना है कि हरियाणा के जाटों ने यशपाल मलिक को समर्थन दिया था, लेकिन वे सरकार के मोहरे निकले। बतौर राठी, मैंने यह बात जाट आरक्षण आंदोलन से पहले ही कह दी थी कि मलिक कमजोर कड़ी साबित होगा। वह जाट समुदाय के मान सम्मान को ठेस पहुंचाएगा। इस बयान का उन्हें ख़ासा विरोध झेलना पड़ा था।
वही हुआ, अब यशपाल मलिक कहां है, कोई बता दे। भाजपा ने उसे मोहरा बनाकर चुनाव जीत लिया। टिकैत को लेकर हम दूसरे किसान नेताओं के साथ बातचीत कर रहे हैं। जोगेंद्र उग्राह, दर्शनपाल और बलबीर राजेवाल आदि नेताओं से संपर्क किया जा रहा है। उन्हें कमजोर कड़ी की सच्चाई की बताई जाएगी। सरदार वीएम सिंह, भानू गुट और रामपाल जाट जैसे नेता इस आंदोलन से अलग हो चुके हैं। उन्हें मालूम था कि कौन नेता इस आंदोलन की कमजोर कड़ी बनेगा। टिकैत को कैसे मालूम है कि ये आंदोलन लंबा चलेगा। वे एक झटके में कह देते हैं कि हम तो अक्तूबर तक बैठ जाएंगे। पहले टिकैत कह रहे थे कि लाल किला उपद्रव में हमारे आदमी शामिल नहीं थे। अब कहते हैं कि दिल्ली पुलिस उन्हें रिहा करे, तभी बातचीत शुरू होगी।
दीपक राठी का कहना है कि केंद्र सरकार ने 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर जो भी रणनीति तैयार की है, उसमें टिकैत की कथित भूमिका संभव है। इसी आधार पर केंद्र सरकार टिकैत को बातचीत के लिए बुला सकती है। चूंकि ये अन्नदाता का आंदोलन है, टिकैत को भरोसा नहीं तोड़ना चाहिए।