राज्यसभा में भाजपा के अपने 86 सांसद हैं। एनडीए के घटक दलों और अन्य छोटी पार्टियों को मिला लें, तो यह संख्या बढ़कर 105 हो जाती है। इसमें अकाली दल के तीन सांसद शामिल नहीं है, क्योंकि पार्टी की तरफ से विधेयक का विरोध किया गया है।
राज्यसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है और इसके लिए एनडीए को 17 सांसदों के समर्थन की जरूरत है। भाजपा बहुमत तक पहुंचने के लिए बीजेडी, एआईएडीएमके, टीआरएस, वाईएसआरसी और टीडीपी के सदस्यों की तरफ देख रही है।
राज्यसभा में बीजेडी के 9, एआईएडीएमके के 9, टीआरएस के 7 वाईएसआर कांग्रेस के 6 और टीडीपी के 1 सदस्य हैं। गौरतलब है कि इन पार्टियों द्वारा अक्सर ही सरकार को सदन में समर्थन दिया जाता रहा है, इसलिए सरकार को यकीन है कि इस बार भी इनसे समर्थन हासिल हो सकता है।
राज्यसभा में कांग्रेस के 40 सांसद हैं और वह सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है। कांग्रेस की तरफ से लगातार इस बिल का विरोध किया जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए में अन्य पार्टियों के सदस्यों और टीएमसी के सांसदों को मिलाकर विपक्ष के पास संख्याबल 85 के करीब है। इनमें एनसीपी के चार और शिवसेना के तीन सांसद भी हैं, जिनसे सरकार ने भी संपर्क किया है।
दूसरी तरफ, इन विधेयकों के विरोध में एनडीए गठबंधन का घटक दल शिरोमणि अकाली दल है, जिसके तीन सदस्य इसके खिलाफ वोट करेंगे। आम आदमी पार्टी के तीन सांसद, समाजवादी पार्टी के आठ सांसद, बीएसपी के चार सांसद भी विधेयकों के विरोध में वोट करेंगे। यानी करीबन 100 सांसद विधेयक के खिलाफ वोट करेंगे।
वहीं, राज्यसभा के 10 सांसद कोरोना संक्रमित हैं और कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। इसमें भाजपा, कांग्रेस आदि के सांसद शामिल हैं। दूसरी तरफ, अलग-अलग पार्टियों के 15 सांसद इस सत्र में भाग नहीं ले रहे हैं। इसे देखते हुए इन विधेयकों को पारित कराने में सरकार को खासा परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। विपक्ष की तरफ से इन विधेयकों को सेलेक्ट कमेटी में भेजे जाने की मांग है, अगर सरकार बहुमत जुटाने में नाकामयाब रहती है तो विपक्ष की मांग सरकार को माननी पड़ सकती है।