अमेरिका-जापान भी देते हैं किसानों को आर्थिक मदद
अमर उजाला डॉट कॉम (www.amarujala.com) से गुरुवार को विशेष वार्ता के दौरान कृषि विशेषज्ञ सोमपाल शास्त्री ने कहा कि दुनिया के किसी भी देश में किसान बिना सरकारी सहायता के लाभ की स्थिति में नहीं है। अमेरिका में भारत की कुल जीडीपी के लगभग एक चौथाई प्रति वर्ष सब्सिडी के रूप में दिया जाता है। यूरोप और जापान तक की व्यवस्था में किसानों को भारी आर्थिक सहायता दी जाती है। ऐसे में भारत जैसे देश में किसानों को खुले बाजार के भरोसे छोड़ना किसी तरह सही नहीं होगा।
पुराना पड़ा भंडारण सीमा कानून
बागपत का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके सोमपाल शास्त्री ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं के भंडारण की क्षमता से संबंधित कानून तब बनाए गए थे, जब देश में कृषि उपज हमारी जरूरतों को पूरा करने में समर्थ नहींं थी। तब भंडारण सीमा निर्धारित कर अनाज की कालाबाजारी रोकी जाती थी। लेकिन आज देश गेहूं, धान जैसी फसलों के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है।
सरकार भी पूरी फसल की खरीद नहीं कर पा रही है। ऐसे में फसलों की खरीद खुले बाजार में करनी पड़ रही है। इन परिस्थितियों के मद्देनजर भंडारण सीमा तय करने का कोई लाभ नहीं है। इसे खुले बाजार के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा फसल की खरीद हो सके और इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचकर लाभ कमाया जा सके।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसान की पहुंच नहीं
पूर्व में योजना आयोग (नीति आयोग) के सदस्य रहे शास्त्री के मुताबिक, देश का 98.6 फीसदी किसान 10 हेक्टेयर से कम भूमि पर खेती करने वाला है। ऐसे में वह अपनी फसल को 50-100 किलोमीटर तक की दूरी तक तो ले जा सकता है, लेकिन उसकी फसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचे, इसकी क्षमता उसमें नहीं है। यह भूमिका इस क्षेत्र में काम कर रहे निजी क्षेत्र के उद्योगपतियों को ही उठानी पड़ेगी। इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्योंकि भारतीय फसलों की गुणवत्ता विश्व में बहुत बेहतर है और इसकी पूरी दुनिया में मांग है। अगर उद्योगपतियों के सहारे भारतीय फल-सब्जियां विश्व बाजार में पहुंचती हैैं तो इससे किसानों को लाभ होगा।
किसान को नहीं दी कोई सुररक्षा
उन्होंने कहा कि वर्तमान कानून में बड़ी खामी यह है कि इसमें किसानों को सुरक्षा नहीं दी गई है। किसी तरह का विवाद होने की स्थिति में उसे एसडीएम स्तर के अधिकारी तक पहुंचना पड़ेगा। लेकिन अफसरशाही को 30 दिनों के अंदर न्याय देने के लिए बाध्य नहीं किया गया है। अगर उसे बाध्य किया जाए तो किसान को तत्काल लाभ मिल सकेगा। इससे किसानों को लाभ मिलेगा।
क्या इस कानून के बाद एमएसपी व्यवस्था खत्म हो सकती है, या किसानों की जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा हो सकता है? इस सवाल पर कृषि विशेषज्ञ ने कहा कि इस सरकार ने किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसलों का डेढ़ गुना मूल्य देने का वायदा 2014 में किया था। लेकिन इसे सरकार ने अगले लोकसभा चुनाव आने के कुछ समय पहले ही इसे लागू किया। लागू करने में भी नीतियों में बदलाव किया गया, जिससे किसानों को पूरा लाभ नहीं मिला। इसलिए किसानों के मन में सरकार की मंशा को लेकर शक है, जो निर्मूल नहीं है।
उन्होंने कहा कि अभी भी प्याज जैसी चीजों के उत्पादन में किसान को प्रति किलो सात रुपये तक की लागत आती है। अगर कोई उद्यमी इसी फसल को बोने के पहले उसे प्रति किलो 10-12 रुपये का मूल्य देने का वायदा कर कांट्रैक्ट खेती कराता है तो इसे किसान के हित में व्यवस्था कही जा सकती है, लेकिन इससे किसानों की जमीन पर किसी के कब्जा होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि यह जमीन से जुड़ा समझौता नहीं होगा, बल्कि यह फसलों को लेकर समझौता किया जाएगा।