प्रख्यात बंगाली साहित्यकार प्रफुल्ल रॉय का गुरुवार दोपहर निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। देश के विभाजन के बाद 1950 में वे स्वतंत्र भारत में कोलकाता रहने आए थे, लेकिन उनके लेखन में देश विभाजन की पीड़ा हमेशा रही।
प्रख्यात बंगाली साहित्यकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रफुल्ल रॉय का गुरुवार दोपहर निधन हो गया। वे 90 वर्ष के थे। उनका जन्म 11 सितंबर 1934 को अविभाजित भारत के बिकासपुर (अब बांग्लादेश में) के राजदिया गांव में हुआ था। देश के विभाजन के बाद 1950 में वे स्वतंत्र भारत आए और कोलकाता को स्थायी निवास बना लिया, लेकिन उनके लेखन में देश विभाजन की पीड़ा हमेशा रही।
विज्ञापन
इसी पीड़ा को उन्होंने अपनी अमर कृति ‘केयापातार नौको’ (केयापत्ता की नाव) में उकेरा, जो आज भी प्रासंगिक है। उनके लिखे कहानियों और उपन्यासों पर आधारित 45 टेलीफिल्म, धारावाहिक और फीचर फिल्में बनी हैं। इनमें पिंजोर (1971), बाघबंदी खेला (1975), मोहनार दिके (1984), आदमी और औरत (1984), एकांत आपन (1987), चराचर (1994), टारगेट (1997) समंद मेयर उपाख्यान (2003), क्रांतिकाल (2005) और केयापातार नौको आदि शामिल हैं।
प्रफुल्ल को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 2003 में उन्हें ‘क्रांतिकाल’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इसके अलावा शरत स्मृति पुरस्कार समेत कई अन्य सम्मानों से भी नवाजा गया। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में प्रतिध्वनि, गुनेर काछाकाछि (आग के पास), भातेर गंधो (चावल की गंध), उत्ताल समयेर इतिकथा, रथयात्रा, पितृभूमि शामिल हैं।