मोबाइल एप के जरिये घर पर डॉक्टर बुलाने के बढ़ते चलत पर फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशंस (फाइमा) ने आपत्ति जताई है। फाइमा ने चेतावनी जारी कर डॉक्टरों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। संस्था का कहना है कि घर पर जाकर मरीज देखना चिकित्सा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसे भोजन या टैक्सी की तरह केवल एप पर बटन दबाकर मिलने वाली 'ऑन-डिमांड' व्यावसायिक सेवा नहीं बनाया जाना चाहिए।
फाइमा ने कहा कि बुजुर्ग, बिस्तर पर रहने वाले, दिव्यांग और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल वाले मरीजों के लिए घर पर डॉक्टर की सुविधा जरूरी हो सकती है। डॉक्टर का घर जाकर मरीज देखना चिकित्सकीय जरूरत और पेशेवर निर्णय के आधार पर होना चाहिए।
घर पर चिकित्सा सेवाओं के लिए राष्ट्रीय मानक बनाने की मांग
संस्था की मुख्य चिंता इस सेवा को डिजिटल मंचों के जरिये व्यावसायिक मॉडल में बदलने को लेकर है। फाइमा ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और अन्य सक्षम संस्थाओं से डिजिटल माध्यम से संचालित घर पर चिकित्सा सेवाओं के लिए राष्ट्रीय मानक बनाने की मांग की है।
मरीज के घर को अस्पताल नहीं माना जा सकता
फाइमा के मुताबिक मरीज का घर अपने आप अस्पताल, क्लिनिक या आपातकालीन केंद्र नहीं बन जाता। कुछ मरीजों की स्थिति में जांच, निगरानी, प्रशिक्षित सहायक, आपातकालीन दवाएं, ऑक्सीजन, पुनर्जीवन की सुविधा और तत्काल अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था जरूरी होती है। इसलिए केवल सुविधा के आधार पर घर पर इलाज का फैसला नहीं किया जा सकता।
संस्था ने डिजिटल मंचों पर डॉक्टरों की नियुक्ति से पहले कई सुरक्षा प्रबंध स्पष्ट करने की जरूरत बताई है। इनमें मरीज की शुरुआती चिकित्सकीय जांच, आपातकालीन सहायता, इलाज का रिकॉर्ड, मरीज की पहचान, इलाज के लिए सहमति, डॉक्टर का पेशेवर बीमा, डॉक्टर की सुरक्षा, मरीज के आंकड़ों की सुरक्षा, दवा लिखने की जिम्मेदारी, अस्पताल भेजने की प्रक्रिया और इलाज से जुड़ी कानूनी जवाबदेही शामिल हैं।