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कोरोना संक्रमण: 24 लाख सुरक्षाकर्मी उठा रहे हैं 'दोहरा जोखिम', अनुशासन और डाइट को जाता है श्रेय

Thu, 08 Apr 2021 06:20 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के सीनियर डॉक्टरों का कहना है, कोरोना संक्रमण के दौरान सुरक्षा कर्मियों को अन्य लोगों के मुकाबले दोहरा जोखिम उठाना पड़ता है। ड्यूटी पर हर समय सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं होता...
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सुरक्षा कर्मी - फोटो : PTI
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विस्तार
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देश में अब दोबारा से कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ने लगे हैं। सुरक्षा बलों के अलावा स्वास्थ्य कर्मी एवं कई दूसरे संगठन भी कोरोना की लड़ाई में फ्रंटलाइन पर काम कर रहे हैं। लगभग 24 लाख जवान, जिनमें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के अलावा विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस संगठन और होमगार्ड शामिल हैं, वे कोरोना संक्रमण के मामले में सामान्य व्यक्ति के मुकाबले 'दोहरा जोखिम' उठाकर ड्यूटी दे रहे हैं। उन्हें यातायात ड्यूटी, कानून व्यवस्था, चुनावी रैलियां, दंगा, कर्फ्यू ड्यूटी, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और कोरोना संक्रमण का लॉकडाउन आदि कई तरह की जिम्मेदारियां का निर्वाहन करना पड़ता है।

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'अनुशासन और डाइट' को श्रेय

इस तरह की ड्यूटी के दौरान उनका सुरक्षा चक्र टूटता रहता है। कहीं पर मॉस्क नीचे खिसकता है, तो कभी हैंड सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं होता। रोजाना आठ-दस घंटे की ड्यूटी तो देनी है। कई बार इससे ज्यादा समय भी लग सकता है। खुद ही वर्दी और जूते भी धोने पड़ते हैं। डॉक्टरों का कहना है, कोविड-19 संक्रमण होने का दोहरा जोखिम उठाने के बावजूद ये सुरक्षा कर्मी स्वस्थ रहते हैं, तो इसके लिए 'अनुशासन और डाइट' को श्रेय दिया जाना चाहिए, जो इनकी प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर नहीं पड़ने देती।

नहीं मिलता साबुन और सैनिटाइजर

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में निदेशक 'मेडिकल' के पद पर काम कर रहे दो सीनियर डॉक्टरों के साथ हुई बातचीत में सामने आया है कि कोरोना संक्रमण के दौरान सुरक्षा कर्मियों को अन्य लोगों के मुकाबले दोहरा जोखिम उठाना पड़ता है। ड्यूटी पर हर समय सैनिटाइजर उपलब्ध नहीं होता। साबुन और पानी भी नहीं मिलता। डॉक्टरों ने कहा, आप रैली को ही देख लें। वहां कितने लोग ऐसे हैं जो मॉस्क लगाकर आते हैं। सुरक्षाकर्मी जब उन्हें संभालने के लिए आगे बढ़ते हैं तो सोशल डिस्टेंसिंग का घेरा टूट जाता है। जमकर धक्कामुक्की होती है। बिना मॉस्क वाले लोगों को हाथ से पकड़ कर इधर-उधर करना पड़ता है। किसी को बस में बैठाना है तो किसी को दौड़कर काबू में करना है। ऐसे में वे खुद अपना ध्यान कैसे रखेंगे। आंतरिक सुरक्षा की ड्यूटी के अलावा बॉर्डर के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लोगों को भी ये सुरक्षा कर्मी कोरोना से बचाने का हर संभव प्रयास करते हैं। लोगों को जागरूक करने के अलावा उन्हें मास्क, दवाएं और सैनिटाइजर मुहैया कराते हैं।
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दिन में कई बार टूटता है सुरक्षा चक्र ...

सुरक्षा बलों के डॉक्टरों का कहना है, बाकी जगह जैसे सरकारी या प्राइवेट कार्यालय, व्यापारिक प्रतिष्ठान, शिक्षण संस्थाएं एवं दूसरे संगठनों में थर्मल स्कैनिंग से लेकर सैनिटाइजर तक की व्यवस्था रहती है। सुरक्षा कर्मियों को जिस स्थिति में काम करना पड़ता है, वहां यह मालूम नहीं होता कि कोई व्यक्ति कोविड संक्रमित है या नहीं। जिन लोगों की भीड़ को ये जवान काबू करते हैं, वहां कोरोना संक्रमण की बात नहीं होती। प्रदर्शन, रैली और यातायात व्यवस्था संभालने के दौरान सुरक्षा कर्मियों को कोरोना संक्रमण का सबसे ज्यादा जोखिम रहता है। वीआईपी ड्यूटी के दौरान जवानों की स्थिति देखी जा सकती है। आम लोग तो जरूरत पड़ने पर ही बाहर निकलते हैं, लेकिन सुरक्षा कर्मी तो अपनी ड्यूटी देनी ही है।   

दोहरे जोखिम के बावजूद ये सुरक्षा कर्मी स्वस्थ रहते हैं

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के सीनियर डॉक्टर बताते हैं, सभी बलों में डाइट को लेकर खास ध्यान रखा जाता है। डाइट में वह सब रहता है, जिससे जवानों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। ड्यूटी खत्म होने के बाद सभी जवान दो घंटे तक व्यस्त रहते हैं। वजह, ये अपनी बैरक या घर जाते ही वर्दी को धोते हैं। वर्दी का कपड़ा ऐसा होता है, जिस पर किसी की छींक या खांसी के कण आसानी से चिपक जाते हैं। अब सभी बलों में यह नियम लागू किया गया है कि जो भी कर्मी छु्ट्टी से वापस लौटता है, तो उसे दो दिन पहले की कोविड-19 जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। इसके बाद यूनिट या बटालियन में उसका अलग से टेस्ट होगा। सालाना मेडिकल और नियमित व्यायाम भी उन्हें दोहरे जोखिम के खतरे से बाहर रखती है। सबसे अच्छी बात ये है कि अधिकांश जवान कहीं बाहर कुछ नहीं खाते हैं। मैस का बना खाना उन्हें स्वस्थ रखता है।
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